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गुलदस्ता है यह जगत आप क्या चुनते हैं फूल या कांटे: आचार्य श्री विमर्शसागर जी की धर्मसभा में भक्तामर की महिमा पर हो रहा व्याख्यान 


जीवन में अच्छाइयां बड़ी कठनाई से प्राप्त होती है और बुराइयां मानव के जीवन में हरपल दरवाजा खटखटाती रहती है। बड़ी गजब की बात है कि मानव अपने जीवन में गुण चाहता है, अच्छाइयां चाहता है लेकिन जब भी बुराइयां आपका दरवाजा खटखटाती हैं। यह उद्बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने सहारनपुर में दिए। सराहनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


सहारनपुर। नगर में गूंज रही है भक्तामर महिमा। जीवन में अच्छाइयां बड़ी कठनाई से प्राप्त होती है और बुराइयां मानव के जीवन में हरपल दरवाजा खटखटाती रहती है। बड़ी गजब की बात है कि मानव अपने जीवन में गुण चाहता है, अच्छाइयां चाहता है लेकिन जब भी बुराइयां आपका दरवाजा खटखटाती हैं। आप तत्काल अपना दरवाजा खोलकर उन बुराइयों का स्वागत, सत्कार, आवभगत करने लग जाते हो। आपसे आदर-सत्कार पाकर वे बुराइयां आपके जीवन में घर बना लेती हैं। यह मांगलिक उद्‌बोधन सहारनपुर में विराजमान आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने जैनबाग में वीरोदय तीर्थ मंडपम के मध्य उपस्थित धर्मसभा में दिया।

आचार्य गुरुवर ने अपने प्रवचन में बतलाया कि यह जगत अच्छाइयों का गुलदस्ता है। आवश्यकता इस बात की है कि आप उन्हें पहचानकर उनका स्वागत करें तो वे अच्छाइयां अवश्य ही आपके जीवन में प्रवेश पाएंगी और यदि आप उन्हें महत्व नहीं देते हैं तो यह जगत् रूपी गुलदस्ता कांटों से भी भरा है। निर्णय आपका है कि आप फूल चुनते हैं या कांटे। आप इस जगत् को जैसा देखना चाहते हैं, आपको यह जगत् का गुलदस्ता वैसा ही दिखाई देगा। आपकी दृष्टि यदि गुणी है अर्थात् गुणों को ही ग्रहण करती है तब आपको जगत् में सब गुणवान ही नजर आएंगे और यदि आपकी दृष्टि छिद्रान्वेषी-दोषग्राही है तब आपको सभी गुणहीन- दोषी नजर आएंगे। निर्णय आपका कि आप क्या बनना चाहते हैं और क्या देखना चाहते हैं?

इसीलिए हमेशा आपका सिक्का भी असली हो 

आज मनुष्य खोटा सिक्का चलाकर असली वस्तु प्राप्त करना चाहता है अर्थात् स्वयं तो अशुभ भावों से भरा है और चाहता है कि मेरे जीवन में भी धर्म के फल दिखाई दें, मेरे जीवन कभी-कभी आपका सिक्का में भी सुख-शांति हो, जो संभव नहीं है। तो सच्चा है किन्तु आप किसी फर्जी दुकान पर पहुंच गए जहां असली वस्तु प्राप्त नहीं होती तब भी आपको असली वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती अर्थात् कभी आपकी श्रद्धा- आपके भाव उत्तम श्रेष्ठ है किन्तु आप वहां पहुंच गए, जहां आपकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ किया जाता है तब भी आपके जीवन में धर्म के फल दिखाई नहीं दे सकते हैं। इसीलिए हमेशा आपका सिक्का भी असली हो और वस्तु भी असली प्राप्त हो। बन्धुओ ! हमेशा आप अपने भाव उत्तम बनाकर रखें और उत्तम पंच परमेष्ठी की शरण को प्राप्त करें तब अवश्य ही आपका कल्याण होगा।

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