दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 154वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“पूत पियारों पिता को, गोहानी लागो घाइ।
लोभ मिठाई हाथ दे, आपन गयो भुलाई॥”
कबीर कहते हैं कि एक पिता के लिए पुत्र जीवन का सबसे प्रिय हिस्सा होता है। लेकिन जब पुत्र के मन में लोभ प्रवेश कर जाता है, तो वह प्रेम और दायित्व से मुंह मोड़कर सिर्फ दिखावटी मीठे व्यवहार (प्रलोभन) से संबंध निभाने का नाटक करता है। वह मिठाई (सुविधा, लाभ, शब्द) तो देता है, पर सच्चे अपनत्व और कर्तव्य से हट जाता है।
यह केवल एक पारिवारिक परिस्थिति नहीं — यह सामाजिक और आध्यात्मिक संकट की ओर संकेत है।
आज रिश्ते भावनाओं पर नहीं, लाभ-हानि की गणना पर टिके हैं।
संपत्ति, वसीयत, या स्वार्थ से जुड़े मतभेदों ने
भाई-भाई को, पिता-पुत्र को, यहाँ तक कि भक्त को प्रभु से भी तोड़ दिया है।
कबीर यह भी कहते हैं:
भक्ति भी जब लेन-देन बन जाए —
“प्रभु! धन दो, मैं मंदिर बनवाऊँगा” —
तो वह भक्ति नहीं, सौदा बन जाती है।
यह दोहा हमें एक आईना दिखाता है —
कि लोभ चाहे घर में घुसे या हृदय में,
वह सबसे पहले उन संबंधों को नष्ट करता है
जो सबसे अधिक मूल्यवान थे।
संदेश स्पष्ट है:
संबंधों में प्रेम हो, लोभ नहीं।
भक्ति में समर्पण हो, सौदा नहीं।













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