मनुस्मृति ग्रंथ में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।। मां जीवंत किवदंती है। मां की महिमा का बखान तो स्वयं भगवान भी नहीं कर पाते। भगवानों ने भी मां के कर्ज को चुकाने में असमर्थता व्यक्त कर दी। मां की मनुष्य जीवन में भूमिका को सहजता से और सरलता से अपने शब्दों में व्यक्त कर रहे है कोटा के पारस जैन पार्श्वमणि पढ़िए उनकी यह प्रस्तुति…
कोटा। जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा नहीं होती है, उनका सम्मान नहीं होता है,वहां किए गए सभी अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं। मां सृष्टि का अनुपम उपहार है। जीवन में मां महात्मा ओर परमात्मा का योगदान सबसे बड़ा होता है। भारत में जितने भी ऋषि मुनि दिव्य महापुरुष, त्यागी, तपस्वी देश भक्त हुए हैं, उन सबकी माताओं के जीवन चरित्र जरूर पढ़ना चाहिए। एक मां जो संस्कार बच्चे को दे सकती है वो संस्कार सौ शिक्षक मिलकर भी नहीं प्रदान कर सकते। मां महात्मा और परमात्मा तीनों का जीवन में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। मां बचपन को सवार देती है। महात्मा जवानी को सुधार देता है और परमात्मा बुढ़ापे को सवार देता है।
मां जीवंत शिक्षालय है
दुनिया में सबसे बड़ा चलता फिरता-शिक्षालय है तो वो है मां। मां के द्वारा दिए गए सद्संस्कार पचपन की दहलीज पार करने के बाद भी ज्यों के त्यों बने रहते हैं। मां से जीवन है। हमारा अस्तित्व है। वजूद है। मां नहीं तो कुछ नहीं। किसी ने कितना खूबसूरत लिखा है ‘मेरी जिंदगी में गर खुशियों का बसर है’ ‘इसमें जरूर मेरी मां की दुआओं का असर है’। मां को धरती की उपमा दी जाती है। विपरीत परिस्थितियों में मां धैर्य को धारण करती है।
भारतीय संस्कृति में मां का स्थान पूजनीय और वंदनीय है
भारतीय संस्कृति में मां का स्थान परम पूजनीय, वंदनीय, अभिनंदनीय रहा है। यदि धरती पर जितने समुद्र नदियां जलाशय हैं उनकी स्याही बना ली जाए और जितने वन-उपवन हैं उनकी कलम बना ली जाए तब भी मां की मां की महिमा गरिमा को नहीं लिखा जा सकता। एक मां का अपने बच्चों के ऊपर इतने परोपकार होते हैं। अगर बच्चा दस जन्म भी लेगा तो अपनी मां का कर्ज नहीं उतार पाएगा। जिनके जीवन में मां बाप का प्यार है वो बड़े भाग्यशाली हैं।













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