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भक्ति का मूल्य नहीं आंका जा सकता भक्ति अमूल्य है : आचार्य श्री विमर्श सागर जी ने भक्तामर स्तोत्र का सार बताया 


आचार्य श्री विमर्श सागर जी ने कहा कि भीड़ भरे बाजार में एक हीरा रखा हो और आपको उसकी सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया हो, वहाँ आप पूरा ध्यान हीरे पर ही केन्द्रित रखते हो। सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


सहारनपुर। आचार्य श्री विमर्श सागर जी ने कहा कि भीड़ भरे बाजार में एक हीरा रखा हो और आपको उसकी सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया हो, वहाँ आप पूरा ध्यान हीरे पर ही केन्द्रित रखते हो। चूंकि हीरा बहुमूल्य है किन्तु जो मूल्यों से भी परे अमूल्य है वह एकमात्र जिनेन्द्र भगवान और उनकी भक्ति। जिनेन्द्र भगवान और उनकी भक्ति को तीन लोक की संपदा देकर भी नहीं खरीदा जा सकता। उन्हें एक मात्र अपनी अंतरंग श्रद्धा से ही प्राप्त किया जा सकता है। एक श्रद्धावान भक्त भगवान के चरणों उसी अनर्घ पद अर्थात् अमूल्य पद को प्राप्त करने की भावना से आता है। आचार्य भगवन् मानतुंग स्वामी भगवान के दर्शन किस प्रकार से करना चाहिए। इसकी विधि श्री भक्तामर स्तोत्र में बताते हैं कि हे भगवन् ! आप अपलक देखने योग्य हो।

दर्शन करने जाओ तो मात्र भगवान को ही देखना

जब भी मंदिर में भगवान के दर्शन करने जाओ तो मात्र भगवान को ही देखना, भगवान को ही देखते रहना, भगवान के सिवाय अन्यत्र अपनी दृष्टि मत डालना। आचार्य भगवन् स्तुति करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार क्षीर समुद्र के मीठे जल को पीने के बाद ऐसा कौन बुद्धिमान मनुष्य होगा, जो लवण समुद्र के खारे जल को पीने की चाह करेगा। अर्थात् कोई भी नहीं। ठीक उसी प्रकार अपलक देखने योग्य आपके वीतरागमय रूप को देखकर ऐसा कौन बुद्धिमान मनुष्य होगा जो अन्य रूप को देखने की इच्छा करेगा, अर्थात् कोई नहीं।

अंदर बैठे भगवान को निहार लेना

बंधुओ! मंदिर में आकर कभी सीसीटीवी कैमरे की भाँति मात्र दूसरों को ही मत देखते रहना । सीसीटीवी कैमरा मात्र दूसरों की ही रील बनाता है, अपनी ओर नहीं देखता। मंदिर में आकर अपनी दृष्टि से भगवान को निहार लेना, पुनः भगवान को निहारने के बाद उसी दृष्टि से अपने अंदर बैठे भगवान को निहार लेना, आपका मंदिर आना सार्थक हो जाएगा

वह उत्पाद- व्यय-ध्रौव्य स्वरूप है

ज्ञानी जीव हर स्थान पर परमात्मा ही नजर आते हैं। जिनेन्द्र भगवान ने संपूर्ण लोक में 6 द्रव्य बतलाए हैं। द्रव्य का लक्षण सत् है। जो सत् अर्थात् मौजूदगी है। वह उत्पाद- व्यय-ध्रौव्य स्वरूप है। जब ज्ञानी जीवों को जगत् के प्रत्येक पदार्थ में यह उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य मय स्वरूप दिखाई देता है, तब ज्ञानी जीव विचार करते हैं कि “अहो ! यही स्वरूप तो द्रव्य का जिनेन्द्र भगवान ने बतलाया है। सर्वत्र जिनेन्द्र भगवान की ही आज्ञा अर्थात् उनके द्वारा बताया हुआ स्वरूप दिखाई दे रहा है यानि जहाँ-जहाँ जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा है वहीं-वहीं जिनेन्द्र भगवान मुझे दिखाई देते हैं।

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