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जय नेमिनाथ के नाद से अन्यायी ताकत हुई ध्वस्त: भक्तों की आस्था की अडिगता ने विजय हुंकार भरी 


श्री नेमि गिरनार धर्मपदयात्रा का सुखद पहलु यह रहा कि भक्तों की आस्था की अडिगता विजय हुई। अन्यायी ताकतों ने प्रयास बहुतेरे किए, लेकिन अहिंसक धार्मिक श्रद्धा के सामने बौने साबित हुए। नेमिनाथ भगवान के मोक्ष कल्याण अवसर पर गिरनार यात्रा का यह शाब्दिक जीवंत वृतांत भक्ति की शक्ति की विजय गाथा भर नहीं, बल्कि प्रमाण है कि एकता के सामने कोई भी ताकत टिक नहीं सकती। इंदौर से गिरनारजी की धर्म पदयात्रा का सजीव वर्णन बता रहे हैं विश्व जैन संगठन, इंदौर के अध्यक्ष मयंक जैन 


इंदौर। विश्व जैन संगठन के तत्वावधान और संजय जैन के नेतृत्व में 23 मार्च को दिल्ली से शुरू हुई श्री नेमि गिरनार धर्म पदयात्रा 5 जून को इंदौर पहुंची थी। इस ऐतिहासिक यात्रा का इंदौर में समस्त समाज ने अभूतपूर्व भव्यता और जोश के साथ स्वागत किया। शोभायात्रा 1.5 किमी से भी लंबी थी। इसमें 15 हजार से भी ज्यादा भक्त सम्मिलित हुए थे। यह हमारी एकता और शक्ति का प्रमाण था। फिर आया 30 जून का वो दिन, जब गिरनार यात्रा के लिए इंदौर से भक्तों का जत्था अभूतपूर्व उत्साह और भव्यता के साथ निकला। लगभग 600 यात्रियों का बसों और ट्रेन से एक साथ गिरनार के लिए निकलना ऊर्जा और उम्मीद का एक ऐसा ज्वार पैदा कर रहा था, जिसने हर दिल में भक्ति की अग्नि प्रज्वलित दी। सभी यात्रियों के अदम्य जोश और अटूट भक्ति भाव के साथ हम गिरनार पहुंचे। गिरनार की हवा मन को असीम शांति से भर रही थी, हर सांस में एक दिव्य अनुभव समाया हुआ था, लेकिन यह शांति जल्द ही अन्याय के तूफान में बदलने वाली थी, जिसे प्रशासन ने खुद आमंत्रित किया था।

दोपहर 1 जुलाई को गिरनार पदयात्रा का प्रवेश भव्य रूप से गिरनार में हुआ और हम सभी इसमें पूरी तन्मयता से सम्मिलित हुए। 2 जुलाई की सुबह 4 बजे हमने 30 हजार से भी अधिक भक्तों की विशाल भीड़ के साथ पहाड़ पर चढ़ना प्रारंभ किया। ‘जय नेमिनाथ, जय गिरनार’ के गगनभेदी नारों के साथ सभी भक्तगण अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े, मानो हर कदम प्रशासन की अंधेरगर्दी को चुनौती दे रहा हो। धीरे-धीरे अंधेरा छंटने लगा, वहां पहाड़ पर कलकल करते झरने बह रहे थे, शीतल हवा रोम-रोम को स्फूर्ति दे रही थी और हम बादलों के ऊपर थे, मानो स्वर्ग में विचरण कर रहे हों लेकिन, इस स्वर्ग में भी अन्याय की काली छाया मंडरा रही थी, प्रशासन की क्रूरता हमारा इंतजार कर रही थी।

आस्था का ऐसा सैलाब कि हर कदम उठा दुगने उत्साह से 

हम पहली टोंक पर पहुंचे, वहां जैन भक्तों की इतनी अपार भीड़ थी कि भगवान भी मुश्किल से दिखाई दे रहे थे, फिर भी दर्शनों की लालसा कम न हुई। आगे की टोंक के लिए रवाना हुए लेकिन, पांचवी टोंक पर जाने के लिए जैनियों के सामान की कठोरता, संवेदनहीनता और अमानवीयता से जांच की जा रही थी। यह कैसा प्रशासन है, जो आस्था पर ही वार करता है? यह कैसी सरकार है, जो भक्तों को लूटती है? उनसे सारी द्रव्य सामग्री, चावल, बादाम, लाडू और नारियल पुलिस द्वारा खुलेआम, बेशर्मी से और अन्यायपूर्ण तरीके से छीन लिए गए। यह हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला था, हमारी आस्था का अपमान था, एक अक्षम्य अपराध। इस घृणित घटना से पूरे जैन समाज में भयंकर रोष और आक्रोश भर गया। कुछ लोगों ने निर्भीकता से, सीना तानकर इसका विरोध किया और उसके बाद पूरा पहाड़ ‘जय नेमि’ के नारों से गूंज उठा, मानो हर भक्त का कंठ अन्याय के खिलाफ एक तोप बन गया हो।

शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो नारे नहीं लगा रहा हो, हर कंठ से विरोध और भक्ति की जयकार एक साथ निकल रही थी। यह प्रशासन के मुंह पर तमाचा था। यह सरकार की नाकामी का सबूत था और कोर्ट के ऑर्डर की अवमानना थी। जैसे-जैसे पांचवी टोंक नजदीक आ रही थी, अन्याय के इस घोर प्रदर्शन के बावजूद सभी लोगों का जोश दुगने-चौगुने गति से बढ़ रहा था, मानो हर कदम पर ऊर्जा का संचार हो रहा हो और हर नारा प्रतिरोध की ज्वाला बन रहा हो।

धैर्य और भक्ति के अनूठे संगम से जीती आस्था 

सभी को दर्शन करने के लिए पर्याप्त समय मिल रहा था, लेकिन, प्रशासन की सख्ती और असामाजिक तत्वों के कारण टोंक पर ‘जय नेमीनाथ’ भी बोलने के लिए तानाशाहीपूर्ण और धमकाने वाले ढंग से मना किया जा रहा था। यह हमारी आस्था को कुचलने की कोशिश थी, जिसे हम कभी सफल नहीं होने देंगे। यह सरकार की मनमानी थी, जिसे भक्त समाज ने सिरे से खारिज कर दिया लेकिन, भक्तों की यह प्रचंड, अडिग भीड़ कहां मानने वाली थी। सभी ने मन ही मन अटूट दृढ़ संकल्प कर लिया था, ‘कोई कुछ भी करे, अंदर जाकर जय तो बोलेंगे ही और अपने हक के लिए लड़ेंगे भी। यह हमारा अधिकार है, कोई हमसे छीन नहीं सकता। सरकार की दादागिरी नहीं चलेगी। भक्तों की भीड़ इतनी थी कि हमें 1 घंटे लाइन में खड़ा रहना पड़ा, कुछ लोगों को तो 2 घंटे भी लाइन में खड़ा रहना पड़ा, फिर भी धैर्य और भक्ति अक्षुण्ण रही और विरोध का स्वर भी बुलंद रहा, जो प्रशासन की नींव हिला रहा था।

आखिर दर्शन, पूजन के बाद अर्घ्य भी स्वीकारे भगवान नेमिनाथ ने 

धीरे-धीरे मैं भी अपने ऊर्जावान और निडर युवा साथियों के साथ पांचवी टोंक के अंदर पहुंच गया। साथियों, मुझे यह लिखते हुए अत्यंत खुशी और गर्व हो रहा है कि मैं अपने लक्ष्य में पूरी तरह सफल हुआ। हमने पांचवी टोंक पर शानदार तरीके से ध्वजा भी फहराई, अन्याय और प्रशासन की तानाशाही के खिलाफ जोरदार ‘जय नेमि जय जय गिरनार‘ भी बोला और निर्वाण लाडू भी चढ़ाया और पूरे जोश से अर्घ्य बोलते हुए बादाम भी चढ़ाए। यह मेरे जीवन की अभी तक की सर्वश्रेष्ठ, सबसे रोमांचक, अविस्मरणीय और विजयपूर्ण यात्रा थी। जिसमें आस्था और साहस का अद्भुत संगम हुआ और हमने अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर दिया। यह हमारी जीत थी और असामाजिक तत्वों की हार।

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