परम पूज्य गुरुमां गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी इस समय ग्वालियर प्रवास पर हैं। आज वह चम्पाबाग जैन धर्मशाला से विहार करते हुए जैन छात्रावास पहुंची। वहां उन्होंने शिलान्यास समारोह में सान्निध्य प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने धर्मसभा को भी संबोधित किया। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…
ग्वालियर। शिक्षा जीवन की अतिआवश्यकता है। जितनी आवश्यकता शरीर को भोजन, हवा, पानी की है, उतनी ही आवश्यकता आत्मा को ज्ञान की है। भोजन से शरीर संतुष्ट होता है, तो ज्ञान से आत्मा संतुष्ट होती है। ज्ञान और शिक्षा संस्कृत का शब्द है। सीख प्राकृत का शब्द है। किसके लिए सीखना, जीवन को संस्कारित करने के लिए सीखना। उक्त विचार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने जैन छात्रावास ग्वालियर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।
दो तरह के कार्य
स्वस्तिधाम प्रणेत्री गुरुमां ने बताया कि कार्य दो तरह के होते हैं। एक कार्यक्रम हुआ, आनन्द लिया और समाप्त हो गया। दूसरा स्थायी रूप से लोगों को लाभ मिलना। आज समाज में बहुतायत संख्या में छोटी-बड़ी संस्थाएं हैं। जो सदैव कोई न कोई आयोजन करते रहते हैं। अच्छी बात है, करना भी चाहिए पर इसके साथ ही शिक्षा और संस्कारों पर भी ध्यान देना चाहिए। शिक्षा के बिना, ज्ञान के बिना, संस्कारों के बिना मानव जीवन व्यर्थ है। हम सभी को अपनी सुविधानुसार इस हेतु प्रयास करना चाहिए। यदि आप साधन सम्पन्न हैं, पढ़े-लिखे हैं तो फुर्सत के समय में किसी भी स्कूल या आश्रम में जाकर धार्मिक पुस्तकें वितरित कर सकते हैं। मन्दिर जी में जाकर वहां रखी पुस्तकों की सफाई आदि करके व्यवस्थित रख सकते हैं।

दो दिन का प्रवास
परम पूज्य गुरुमां गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी इस समय ग्वालियर प्रवास पर हैं। आज वह चम्पाबाग जैन धर्मशाला से विहार करते हुए जैन छात्रावास पहुंची। वहां उन्होंने शिलान्यास समारोह में सान्निध्य प्रदान किया। अभी दो दिन पूज्य माताजी का प्रवास जैन छात्रावास में ही रहेगा।













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