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धर्मसभा को किया संबोधित : जीव अनन्तकाल से क्षेत्र परिवर्तन कर रहा है-स्वस्तिभूषण माताजी


जैन साध्वी गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने चम्पाबाग जैन धर्मशाला, ग्वालियर में धर्म सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि घूमने जाना और तीर्थयात्रा पर जाना, दोनों में अंतर है। घूमने में दृश्य देखने जा रहे हैं, मनोरंजन करने जा रहे हैं। तीर्थयात्रा में भी घूमना होता है पर उसमें आप वीतरागी जिनेन्द्र प्रभु के, अपने इष्ट के दर्शन करने जा रहे हैं। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट..


ग्वालियर। आत्मा से जुड़ोगे तो स्वरूप दिखेगा। बाहर से जुड़ोगे तो रूप दिखेगा। क्षेत्र परिवर्तन अनन्तकाल से कर रहे हैं। सुमेरु के नीचे आठ मध्य स्थान में एक-एक करके जन्म लिया। ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां जन्म न लिया हो। धरती है तो वैसे जीव बन गए, पानी है तो जलकायिक बन गए, पेड़ है तो वनस्पति कायिक जीव बन गए लेकिन लोक का कोई स्थान शेष नहीं बचा, जहां जन्म न लिया हो। उक्त विचार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने चम्पाबाग जैन धर्मशाला, ग्वालियर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।

घूमने जाना और तीर्थाटन में है अंतर

स्वस्तिधाम प्रणेत्री गुरुमां ने कहा कि विचार करो, दुनिया कितनी बड़ी है। इतनी बड़ी दुनिया में कोई हिस्सा शेष नहीं। लोग घूमने जाते हैं। लोगों ने भ्रमणशील स्वभाव बना रखा है। स्थिरता नहीं हैं, एक स्थान पर शांति से टिककर नहीं रहा जाता। जीवन में भागमभाग मची है। घूमने जाना और तीर्थयात्रा पर जाना, दोनों में अंतर है। घूमने में दृश्य देखने जा रहे हैं, मनोरंजन करने जा रहे हैं। तीर्थयात्रा में भी घूमना होता है पर उसमें आप वीतरागी जिनेन्द्र प्रभु के, अपने इष्ट के दर्शन करने जा रहे हैं। घूमना दोनों में है पर एक में भ्रमण मिटाने का काम है। साधु-संत तो सदैव भ्रमण ही करते हैं लेकिन पर दोनों के भ्रमण का उद्देश्य अलग-अलग है। मोह न बढ़ जाये इसलिए साधु-संत स्थान परिवर्तन करते हैं।

विचारों से पड़ता है फर्क

गुरुमां ने कहा कि व्यक्ति दूसरा चक्कर लगाकर वापिस वहीं आ जाते हैं। मोह को हवा खिलाने जाते हैं, मोह ताजा करने जाते हैं। वापिस फिर उसी मोह के जाल में घूमते हैं। जब कोई बीमार होता है या टेंशन में होता है तो चिकित्सक कहता है कि हवा पानी चेंज करो, स्थान परिवर्तन करो। स्थान परिवर्तन, क्षेत्र परिवर्तन, हवा पानी चेंज से विचार परिवर्तित होते हैं और शरीर में परिवर्तन आता है। जीवन का सारा सिस्टम हमारे विचारों से चलता है। हमारी सोच ही छोटी है। मकान बड़ा है या छोटा, उससे उतना फर्क नहीं पड़ता, विचारों से फर्क पड़ता है। जन्म स्थान सारा तीन लोक है, हम केवल वर्तमान को पकड़ते हैं। वेद, पुराण, शास्त्रों का अध्ययन करके हमें अपने विचारों को विस्तृत करना होगा, हमें अपने विचारों को विशाल बनाना होगा। तीन लोक हमारा जन्म क्षेत्र है, इसी का नाम क्षेत्र परिवर्तन है।

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