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चातुर्मासिक प्रवचन में बह रही ज्ञान की गंगा : पर्याय की अपेक्षा से जीव बार-बार मरता है – विज्ञानमति माताजी


उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हुत सारे मत-मतांतर हैं उनको सुनकर जिनेंद्र भगवान के बारे में संशय नहीं करना। क्या पता ऐसा होता होगा, क्या पता वैसा होता होगा। बहुत लोग आएंगे तुम्हें समझाने। क्यूं शरीर को कृष कर रहे हो, इससे मोक्ष होता है क्या। जब भी मोक्ष होगा महाराज बनकर ही होगा। लोक में अपने तर्क से भ्रम फैलाने वाले बहुत हैं लेकिन भ्रमित नहीं होना। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…


इंदौर। उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि…

-विपरीत मिथ्यात्व मतलब – धर्म को विपरीत मान लेना, तत्व को उल्टा समझ लेना है।

-एकांत मिथ्यात्व मतलब – द्रव्य के दोनों धर्मों को एक साथ नहीं मानना, एक पक्ष से ही मानना…एक ही द्रव्य में दो विपरीत धर्म होते हैं, प्रत्येक द्रव्य नित्य भी है, अनित्य भी है, नास्ती भी है, अस्ति भी है, क्षणभंगुर भी है शाश्वत भी है। जीव अजर अमर भी है और नश्वर (पर्याय की दृष्टि से) भी है। अब हमने रट लगा ली जीव अजर-अमर है, ये एकांत मिथ्यात्व है। अरे भाई जीव का मरण नहीं होगा तो उसका मोक्ष कैसे होगा। पर्याय की अपेक्षा से जीव बार-बार मरता है। भी अनेकांत (सम्यग्दर्शन) का चिह्न है और ही मिथ्यात्व का चिह्न है। 24 घंटे जहां भी चले जाओ, द्रव्य में उत्पाद व्यय चलता रहता है और उसमें ध्रोव्य सदा बना रहता है।

-विनय मिथ्यात्व – अपन तो सबसे छोटे हैं। सबको नमस्कार करो, सबकी सेवा करो, अपना कल्याण हो जाएगा…ये विनय मिथ्यात्व है। जो जिस योग्य हो, वैसी विनय करना चाहिए।

-संशय मिथ्यात्व – जिनवचनों में शंका करना…कभी भी शंका नहीं करना चाहिए…जब भी मोक्ष होगा, निर्ग्रंथ अवस्था में ही होगा…बहुत सारे मत-मतांतर हैं उनको सुनकर जिनेंद्र भगवान के बारे में संशय नहीं करना। क्या पता ऐसा होता होगा, क्या पता वैसा होता होगा। बहुत लोग आएंगे तुम्हें समझाने। क्यूं शरीर को कृष कर रहे हो, इससे मोक्ष होता है क्या। महाराज बनने से मोक्ष होता है क्या, भैया जब भी मोक्ष होगा महाराज बनकर ही होगा। गद्दी पर बैठे-बैठे नहीं होगा। लोक में अपने तर्क से भ्रम फैलाने वाले बहुत हैं लेकिन भ्रमित नहीं होना। भ्रम में आ जाना ही संशय मिथ्यात्व है।

-अज्ञान मिथ्यात्व – अगला भव किसने देखा ऋण लेकर के घी पीओ। मौज करो, आनंद से रहो। इस प्रकार अपने हित के बारे में नहीं सोचना अज्ञान मिथ्यात्व है।

हमने इन पांच मिथ्यात्व के वश होकर के कितने कितने पाप किए हैं…

– जिन्होंने जमींकंद का त्याग है उनको सूखी अदरक (सौंठ) नहीं खानी चाहिए। अदरक जब तक वृक्ष के ऊपर ही सूख नहीं जाती वो सौंठ नहीं बनती।

– अंधे से भी अंधा कौन है रागी, जिसको किसी के प्रति अत्यधिक राग है उसे उसके अलावा कुछ नहीं दिखता, वो आंख होते हुए भी अंधा ही है।

-शूरवीर कौन है – जो स्त्री के कटाक्षों से प्रभावित नहीं होता, वासना उसके मन में नहीं आती वो शूरवीर है।

-ये पुरुष बार-बार स्त्री की बुराई करते हैं लेकिन उसके बिना रह नहीं पाते।

-स्वदार संतोष व्रत – बहुत बड़ा व्रत है। ये सीता जी की अग्नि को पानी करने वाला व्रत है, सुदर्शन सेठ की सूली को सिंहासन करने वाला व्रत है। आपने जिंदगी में कभी पर स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली होगी, कभी मन में विचार नहीं किया होगा कि पर स्त्री का सेवन करेंगे लेकिन कभी संकल्प नहीं लिया कि हम अपनी विवाहित स्त्री पर संतुष्ट रहेंगे। यदि ये संकल्प नहीं लिया है तो आपका स्वदार संतोष व्रत नहीं है। सब लोग संकल्प कर लेना भगवान चंद्रप्रभ के सामने कि अपनी वैवाहित स्त्री को छोड़कर के अन्य किसी को भी वासना की दृष्टि से नहीं देखूंगा। बहन की दृष्टि से, मां की दृष्टि से देखूंगा।

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