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सोच का परिणाम नर से नारायण बना सकता है: तुलसीनगर में रविवारीय धर्मसभा हुई


इंदौर के तुलसी नगर में विराजित मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज जी ने रविवार्य धर्म सभा में बड़ी संख्या में मौजूद जैन समाज के श्रावकों को संबोधित किया उन्होंने चार प्रकार की सोच पर विस्तार से प्रकाश डाला। इंदौर से पढ़िए यह खबर…


इंदौर। हमारी सोच ही हमें ऊपर उठाती है तथा हमारी सोच ही हमें नीचे गिराती है। हमारी सोच की दिशा सही है तो हम शिखर पर पहुंचेंगे और सोच की दिशा ही गलत हैतो शिखर पर पहुंच कर भी रसातल में पहुंच जाएंगे। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने तुलसीनगर दिगंबर जैन मंदिर में रविवारीय धर्म सभा में व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा कि सोच के परिणाम से नर से नारायण बना जा सकता है। वही नर से नारकी भी बनकर यह मनुष्य जीवन को नष्ट भी कर सकते हो।

चार प्रकार की सोच पर चर्चा
उन्होंने चार प्रकार की सोच पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की सोच भौतिक, व्यावसायिक व्यवहारिक तथा आध्यात्मिक सोच हुआ करती है। जिनकी सोच “खाओ पिओ मौज करो, कर्जा लो और घी पिओ” की होती है। ऐसे लोगों को ज्यादा उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोग दृश्य जीवन के अलावा और कुछ देखते नहीं। उनकी सोच सारी जिंदगी भौतिक संसाधनों को एकत्रित करने तथा “पदार्थ जन्य भोगों “तथा मौज मस्ती में ही पूरा जीवन खपा देते है।

रेत से तेल निकालना फिर भी संभव
उन्होंने कहा कि भौतिक सुखों की प्राप्ति में सुख नहीं वल्कि यह मृगतृष्णा मात्र है। जैसे रेगिस्तान जल की खोज करते-करते वह मृग भटककर अपने प्राण गंवा देता है। उसी प्रकार भौतिक संसाधनों को इकट्ठा करते करते यह मानव पर्याय नष्ट हो जाती है। संत कहते हैं कि रेत से तेल निकालना फिर भी संभव है, लेकिन भौतिक संसाधनों से सुख की खोज करना अंतहीन दौड़ है। इसमें केवल भागम भाग और आपाधापी है, भटकाव है, ठहराव बिल्कुल नहीं। उन्होंने कहा कि भौतिक सुखों का आलंबन उतना ही लो जितना आवश्यक है।

पश्चिमी सभ्यता हमारे ऊपर हावी
मुनिश्री ने कहा कि जब से पश्चिमी सभ्यता हमारे ऊपर हावी हुई है तबसे लोगों की सोच व्यवसायिक हो गयी है। वह घर परिवार में भी नफा नुकसान देखने लगा है। यदि पुत्र पिता में पिता पुत्र में भाई भाई में पति पत्नी में पत्नी पति में समाज में संबंधों में यदि आप नफा-नुकसान को देखोगे तो आप अपनी व्यवहारिकता को खो दोगे।

अपनी आत्मा के उन्नयन की ओर देखते हैं
उन्होंने तीसरी सोच का व्यक्ति जो मात्र अपनी छवि अपने स्टेटस को मेंटेन करने में लगा रहता है, ऐसे लोग व्यवहारिक स्तर पर तो ठीक होते है लेकिन, उनका अंतरंग भी ठीक हो वह जरूरी नहीं। वह अपनी यश प्रतिष्ठा को बनाने का तो प्रयास करता है। वह अपनी आध्यात्मिक सोच को विकसित नहीं कर पाए यह जरूरी नहीं। जिनकी सोच आध्यात्मिक होती है वह बाहर के साथ-साथ अपनी आत्मा के उन्नयन की ओर भी देखता है।

कुछ लोग अपने आपको मॉर्डन कहते हैं
मुनि श्री ने कहा कि जो लोग समाज में अग्रणी है। यदि वह अच्छा कार्य करते हैं तो सभी लोग उनके मुरीद हो जाते है। उन्होंने धनाढ्य लोगों की अपेक्षा मध्यमवर्गीय लोगों की तारीफ करते हुए कहा कि धर्म के क्षेत्र में मध्यमवर्गीय लोगों का योगदान अच्छा रहता है। उन्होंने कहा कि आजकल कुछ लोग अपने आपको मॉर्डन जैन कहते हैं। ऐसे लोग दान के बल पर समाज के मुखिया भी बन जाते हैं। संतों के साथ भी रहते हैं। लेकिन आचरण के नाम पर जीरो हैं। उनको शराब पीने तथा अंडा आदि खाने से भी कोई गुरेज नहीं होता है।

यह मुनिश्री और क्षुल्लक जी मौजूद रहे
मुनिश्री ने कहा कि अच्छा बनो साथ-साथ अपने अंदर भेद विज्ञान को जाग्रत कर आत्मतत्व को भी जगाएं। इस अवसर पर मुनि श्री निर्वेगसागर महाराज एवं संधान सागर महाराज सहित समस्त क्षुल्लक गण विराजमान थे।

नित हो रहे हैं प्रवचन शंका समाधान
कार्यक्रम का संचालन नितिन भैया ने किया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू और धर्मप्रभावना समिति के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रातः प्रवचन 9 बजे से एवं सांयकालीन शंका समाधान 5:45 से प्रतिदिन हो रहा है। इस अवसर पर महालक्षमी नगर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे है।

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