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क्षमा से ब्रह्मचर्य तक: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रवचनों में जीवन की राह


– निष्कर्ष दशलक्षण महापर्व केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का अवसर है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, दान और ब्रह्मचर्य- ये सभी धर्म आत्मा के आभूषण हैं। इनके पालन से आत्मा पवित्र होती है और मोक्ष की ओर अग्रसर होती है। पढ़िए पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का दश लक्षण पर विशेष प्रवचन श्रीफल जैन न्यूज में….


दश लक्षण महापर्व है। वर्षभर याद करते हैं — आ रहा है, आ गया और चला गया। 355 दिन प्रतीक्षा के बाद दस दिन बाद वह चला जाता है। दश लक्षण पर्व वर्ष में तीन बार आता है, जबकि यह प्रति समय हमारे साथ होना चाहिए। महापर्व को आप भूलने का प्रयत्न नहीं करें। इसे स्मृति में रखें।

 

सारा संसार विषय और कषायों से भरा हुआ है। अनादि काल से आप संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं। संसारी लोगों ने विषय और कषाय को हितकारी माना है; इस कारण आप दुखी हैं। दश लक्षण पर्व तीन बार माघ, चैत्र और भाद्रपद माह में आता है।

 

सोचना यह है कि दश लक्षण पर्व के पहले सोलह कारणों की पूजा की जाती है। इन 16 कारणों की पूजा से तीर्थंकर नामक कर्म का बंधन होता है। इसलिए दश लक्षण से पूर्व 16 कारण पर्व आता है। यह महापर्व धरोहर बनकर आए हैं।

 

आत्मा में विभव परिणीति है; इस कारण चारों गति में दुख होता है। रक्षाबंधन भी महापर्व है। विष्णु कुमार मुनि ने 700 मुनि राज की रक्षा की थी। देव-शास्त्र गुरु हमारे आराध्य देव हैं; उनके बिना संसार से पार होने का मार्ग नहीं मिलता। देव हमारे हृदय में विराजमान होना चाहिए। स्थापना में तो आप सबको बुलाते हैं और विसर्जन में कहते आए — जो देवगण और उन्हें जाने का कहते हैं। धर्म को धारण करना चाहिए, छोड़ना नहीं। पर्व में विशेष प्रकार की आराधना की जाती है। पर्व मुनि राज के हैं, श्रावक भी धारण कर सकते हैं।

 उत्तम क्षमा धर्म

जीवन में वस्तुओं को जानने के कुछ लक्षण होते हैं और जीवन के कुछ ही क्षण। यूं तो पर्व बहुत आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन आत्मा को जानने का पर्व दशलक्षण है। वह जो आत्मा को पवित्र करें, जिसके निमित्त हमारी आत्मा पवित्र होती है, उसे पर्व कहते हैं।

दशलक्षण पर्व में 10 दिन तक 10 धर्मों की आराधना की जाती है।

स्वभाव प्राप्ति के लिए सबसे पहले है उत्तम क्षमा…

“उत” अर्थात उखाड़ दिया

“तम” अर्थात अंधकार को

जिस क्षमा के आने पर अज्ञान अंधकार, दर्शन मोह, चरित्र मोह का अंधकार नष्ट हो चुका है, उसी का नाम है उत्तम क्षमा।

आचार्य श्री कहते हैं — क्षमा चाहिए, सम्यक दृष्टि की क्षमा, क्षमा भाव की क्षमता। आइस फैक्ट्री जैसी क्षमता नहीं चाहिए; समता की फैक्ट्री होना चाहिए। बर्फ देखने को ठंडी होती है, लेकिन वास्तविकता में गर्म होती है।

सम्यक दृष्टि की क्षमता का नाम है उत्तम क्षमा। पांच प्रकार की अग्नि बताई गई है, जिसे हम किस प्रकार के जल से शांत कर सकते हैं:

क्रोध अग्नि – क्षमा रूपी जल

काम अग्नि- ब्रह्मचर्य व्रत

आर्त ध्यान अग्नि – धर्म ध्यान

जठ अग्नि – अनशन आदि ब्राह्य तप

कर्म अग्नि – संवर-निर्जरा रूपी जल

क्रोध कायरों का काम है और क्षमा वीरों का आभूषण। क्षमा रुपी खड़क तलवार से सभी पर विजय पाई जा सकती है। संसार में आज तक क्रोध के द्वारा किसी ने किसी को नहीं जीता।

 

संसार के प्राणी अग्नि ताप से घबराकर शीतल झरने की तलाश में हैं। यदि मनोरंजन करना ही है तो ऐसे कार्य करें जो अलौकिकता और आध्यात्मिकता की ओर ले जाएं। क्षमा को पृथ्वी के समान कहा गया है।

 “आज का पर्व हमें सहनशील होना सिखाता है।”

क्षमा का विरोधी क्रोध है। शास्त्रों में बताया गया है, मनुष्य का आभूषण रूप, रूप का आभूषण गुण, गुण का आभूषण ज्ञान, और ज्ञान का आभूषण क्षमा।

उत्तम मार्दव धर्म

परिणाम की कोमलता उत्तम मार्दव धर्म है।

-मान कभी करना नहीं और स्वाभिमान कभी छोड़ना नहीं।

– सरल स्वभाव वाला, विनम्र गुण वाला, कोमल हृदय वाला व्यक्ति संपदा और आशीर्वाद पाता है।

– नमन और विनय से मोक्ष का द्वार खुलता है।

मार्दव भाव आत्मा का गुण है और अहंकार का नाशक।

उत्तम आर्जव धर्म

मन, वचन और काय में कुटिलता का परित्याग करके सरल निष्कपट भाव धारण करना उत्तम आर्जव धर्म है।

– सरल भाव धारण करने वाला अत्यंत सरस और मधुर होता है।

– आर्जव का अर्थ — विचार, वचन और आचरण में सामंजस्य।

 उत्तम सत्य धर्म

दशलक्षण पर्व का चौथा दिन उत्तम सत्य धर्म के नाम।

-सत्य का अर्थ है तत्वों का सम्यक प्रस्तुतीकरण।

-सत्य विहीन आचरण कोरा आडंबर है।

-सत्य बोलने से समाज और आत्मा दोनों का कल्याण होता है।

उत्तम शौच धर्म

शौच धर्मआत्मा की पवित्रता का माध्यम है।

-लोभ, भोग और तृष्णा आत्मा की शुद्धता नष्ट करते हैं।

-शौच धर्म के पालन से आत्मा निर्मल और निर्लोभी बनती है।

उत्तम संयम धर्म

संयम धर्म का अर्थ है इच्छाओं और इंद्रियों का नियंत्रण।

-संयम आत्मा की उन्नति और शक्ति का साधन है।

-हिंसा, झूठ, चोरी और परिग्रह से विरत रहना संयम ह

उत्तम तप धर्म

तप धर्म का अर्थ है इच्छाओं का परित्याग और कर्मबंधन से मुक्ति।

-तप आत्मा को शुद्ध करता है।

-इच्छाओं का त्याग तप का मूल है।

उत्तम त्याग धर्म

त्याग धर्म में सांसारिक मोह, लोभ और भोग का त्याग शामिल है।

-त्याग से शांति और समभाव प्राप्त होता है।

-आचार्य श्री के अनुसार असली त्याग में आंतरिक और बाहरी परिग्रह का त्याग शामिल है।

उत्तम दान धर्म

दान धर्म आत्मा और समाज की समृद्धि का साधन है।

-आहार दान, शास्त्र दान, अभय दान और औषधि दान के माध्यम से पुण्य की प्राप्ति होती है।

आकिंचन्य धर्म

आकिंचन्य धर्म का अर्थ है परिग्रह रहित जीवन।

-बाहरी और आंतरिक परिग्रह का त्याग आत्मा को स्वतंत्र बनाता है।

-आकिंचन्य पुरुष संसार से पार उतरता है और मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

ब्रह्मचर्य धर्म

ब्रह्मचर्य यानी शरीर, मन और वचन का ब्रह्मसंबंधी आचरण।

-ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने वाला आत्मा में पूर्णता प्राप्त करता है।

-दशलक्षण पर्व में ब्रह्मचर्य की विशेष पूजा होती है।

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