समाचार

उत्तम तप पर दिए प्रवच : सिद्धि का उपाय तप ही है – आचार्य विशुद्ध सागर जी 


‘पर्वराज पर्युषण महापर्व पर आयोजित ” श्रावक साधना-संयम संस्कार शिविर” में सम्बोधन करते हुए, अध्यात्मयोगी आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि- “ज्ञान प्रकाशक है, तप शोधक है। तपस्या से आत्म-सिद्धि होती है। तप से कर्मों का क्षय होता है। तप से कषायें मंद होती हैं। तप सुख-शांति का श्रेष्ठ उपाय है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


नांदणी मठ (महाराष्ट्र)। ‘पर्वराज पर्युषण महापर्व पर आयोजित ” श्रावक साधना-संयम संस्कार शिविर” में सम्बोधन करते हुए, अध्यात्मयोगी आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि- “ज्ञान प्रकाशक है, तप शोधक है। तपस्या से आत्म-सिद्धि होती है। तप से कर्मों का क्षय होता है। तप से कषायें मंद होती हैं। तप सुख-शांति का श्रेष्ठ उपाय है। तप मुक्ति का साधन है। तप आनन्द का द्वार है।” जितना जितना हम संग्रह करेंगे, उतना-उतना कष्ट बढ़ेगा। संग्रह में दुःख है, संग्रह में पीड़ा है, संग्रह में वेदना है, संग्रह में चिन्ता है संग्रह में भय है, संग्रह में कलह है, संग्रह में ईष्र्या है, संग्रह में भटकाव है, संग्रह में कामना है संग्रह में कषाय है, संग्रह में बंध है और बंध ही संसार सागर में भ्रमण का कारण है। बाह्य् और अंतरंग तप दो प्रकार के होते हैं।

अनशन (उपवास) भोजन-पानी आदि सेवन का त्याग पूर्वक गुरुवाणी का पान करना, ऊनोदर (भूख से कम खाना ), वृत्तिपरिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्त शट्यासन और काय-क्लेश ये छह बाहय-तप है। पापों का पश्चाताप रूप प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह आभ्यन्तर तप हैं। निस्वार्थ भावना से किया गया तप ही वास्तव में कल्याणकारी होता है। आकांक्षा सहित किया गया तप स्वर्ग तो पहुंचा सकता है, परन्तु वह कर्म शांति, मुक्ति का साधन नहीं है। संयम के साथ किया गया तप सर्वश्रेष्ठ है। आत्म- कल्याण के उद्‌देश्य से किया गया तप ही शान्ति का साधन है। सम्यक्- उद्‌देश्य, आत्म-शुचिता, आत्म-सुख, आत्मानन्द के लिए किया गया तप ही हितकारी होता है। साधना में मुद्राओं का विशेष महत्त्व होता है। शरीर साधना में सहायक है।” प्राणायाम, योगा से तन स्वस्थ होता है और तत्त्व- चिंतन, आत्मध्यान से चेतन स्वस्थ होता है। तप साधना से तन व आत्मन् दोनों ही स्वस्थ होते हैं। तप करो, कर्म हरो। जप करो, सिद्धि प्राप्त करो।

तप निर्जरा का साधन है। उन्होंने कहा कि ज्ञान ध्यान पूर्वक, राग-द्वेष के त्याग पूर्वग क्षमावान साधु के तप से धर्म का उघोतन होता है। भोगों में शान्ति नहीं, योग में आनन्द है। भोग छोड़ो, योग धारण करो। दिगम्बर मुनिराज वर्षाकाल में वृक्ष के नीचे योग धारण करते हैं, ग्रीष्म की भीषण तपन में पर्वत पर सूर्य की ओर मुख करके आतपन योग धारण करते हैं और भीषण ठंडी में नदी तट पर योगधारण करते हैं। यह योग उनके कर्मों का क्षय कराता है। मुक्ति का साधन है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page