शिक्षा के साथ संस्कारों का होना अतिआवश्यक है। बच्चों को किताबी ज्ञान मिलता है, लेकिन वे संस्कारों से दूर रहे हैं। होना यह चाहिए कि स्कूलों में किताबी ज्ञान के साथ संस्कारों का बीजारोपण भी किया जाए। यह उद्गार मां स्वस्ति इंटरनेशनल स्कूल के वार्षिकोत्सव के अवसर आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने वर्जुअल व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। शिक्षा के साथ संस्कारों का होना अतिआवश्यक है। वर्तमान में स्कूली शिक्षा में बच्चों को किताबी ज्ञान मिलता है, लेकिन वे संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। होना यह चाहिए कि स्कूलों में किताबी ज्ञान के साथ साथ बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण भी किया जाए। यह उद्गार मां स्वस्ति इंटरनेशनल स्कूल के वार्षिकोत्सव के अवसर आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने वर्जुअल व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्कूली शिक्षा ज्ञान और कौशल सिखाती है, जबकि संस्कार नैतिक मूल्य, सही आचरण और जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक सभ्य, सफल और जिम्मेदार व्यक्ति तथा समाज के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि, व्यक्ति शिक्षा के बिना अज्ञानी और संस्कारों के बिना चरित्रहीन हो सकता है। उन्होंने कहा कि जीवन में शिक्षा और संस्कार दोनों का महत्व है। शिक्षा और संस्कार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा दिशा देती है और संस्कार उस दिशा में चलने की प्रेरणा और शक्ति देते हैं। आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने कहा कि केवल किताबी शिक्षा से व्यक्ति जीवन में भटक सकता है, लेकिन शिक्षा के साथ संस्कार मिलने से जीवन सरल और सफल बनता है। एक शिक्षित व्यक्ति बुद्धिमान हो सकता है, लेकिन एक संस्कारवान व्यक्ति ही देश, समाज के लिए उपयोगी और अच्छा इंसान बन सकता है। इसलिए, बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्यों और अच्छे आचरण की शिक्षा देना बहुत ज़रूरी है, ताकि वे एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकें। देश, धर्म, समाज और परिवार के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ साथ संस्कारवान होना भी जरूरी है।
नौ रसों का प्रभावशाली प्रदर्शन
विगत दिवस मां स्वस्ति इंटरनेशनल स्कूल में वार्षिक उत्सव सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया। इस वर्ष के वार्षिक समारोह की थीम ‘नवरस: जीवन के नौ भाव’ पर आधारित थी। जिसके माध्यम से विद्यार्थियों ने मानव जीवन की विविध भावनाओं को मंच पर सजीव रूप में प्रस्तुत किया। इस अवसर जैन छात्रावास के बच्चों ने वाद्ययंत्रों के माध्यम से सुंदर प्रस्तुति दी। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई। विद्यार्थियों ने नृत्य, नाट्य एवं संगीत प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत एवं शांत इन नौ रसों का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। बच्चों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
नवरस थीम बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने में सहायक
विद्यालय के डायरेक्टर्स ने पालकों और विद्यार्थियों से कहा कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन बच्चों के आत्मविश्वास, रचनात्मकता और नैतिक मूल्यों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सभी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के प्रयासों की सराहना की। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने कहा कि नवरस जैसी थीम बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास में सहायक है। उन्होंने विद्यालय की प्रगति रिपोर्ट के साथ साथ आगामी कार्य योजना भी प्रस्तुत की। कार्यक्रम के अंत में अभिभावकों एवं अतिथियों ने विद्यार्थियों की प्रतिभा की मुक्तकंठ से प्रशंसा की और विद्यालय परिवार को इस सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं दीं।
गुरुमां स्वस्तिभूषण ने सभी को दिया शुभाशीष
कार्यक्रम के मध्य वर्जुअल माध्यम से आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने समस्त बच्चों, पालकों एवं स्टाफ को शुभाशीष प्रदान किया। जैसे ही गुरुमां ने शुभाशीष के लिए हाथ उठाया। संपूर्ण सभा मंडप तालियों की गड़गड़ाहट और उनके जय जयकारों से गूंज उठा। सभी के चेहरे पर प्रसन्नता और खुशी के भाव दृष्टिगोचर हो रहे थे।













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