दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -147 वास्तविक धर्म वह है जो अंतःकरण को शुद्ध करे : शरीर को नहीं, मन को स्नान कराने की आवश्यकता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 147वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


नहए धोए क्या हुआ, जो मन मैल न जाय।

मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाय॥


भावार्थ और व्याख्या:

संत कबीरदास इस दोहे में एक अत्यंत गहन आध्यात्मिक सत्य उजागर करते हैं। वह कहते हैं कि केवल बाहरी रूप से स्नान कर लेने या शरीर को शुद्ध कर लेने से कुछ नहीं होता, जब तक मन के भीतर बसे दोष — जैसे अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या, वासना, लोभ — नहीं मिटते।

कबीर एक सशक्त उपमा देते हैं:

मछली जो जीवन भर जल में रहती है, फिर भी उसकी गंध (बास) नहीं जाती। यह दर्शाता है कि केवल बाहरी संपर्क (जैसे जल में रहना) से आंतरिक अशुद्धि समाप्त नहीं होती।

 

ठीक उसी तरह, यदि मनुष्य केवल तीर्थ स्नान, व्रत, दान, हवन, पूजा आदि करता है, लेकिन उसके विचार और व्यवहार में कोई शुद्धता नहीं आती, तो वह धर्म के वास्तविक उद्देश्य से दूर है।

आडंबर और कर्मकांडों की पुनरावृत्ति तब तक व्यर्थ है, जब तक मन निर्मल न हो।

कबीर का संदेश:

कबीरदास उन लोगों को आईना दिखाते हैं जो धर्म को केवल बाहरी आचरण, वस्त्रों की सफेदी, मंदिरों में उपस्थिति या रस्मों के पालन तक सीमित रखते हैं।

यदि व्यक्ति के विचार और चरित्र पवित्र नहीं हैं, तो केवल पूजा-पाठ करना या साफ वस्त्र पहन लेना किसी लाभ का नहीं।

 

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

You cannot copy content of this page