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84 लाख मंत्रों का महामंत्र 'णमोकार महामंत्र : आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने बताई महामंत्र की महत्ता


आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने पंचकल्याणक में अपने प्रवचन में कहा कि 9 अप्रैल को महामंत्र णमोकार का पाठ पूरे विश्व में गूंजेगा। आचार्य श्री ने णमोकार मंत्र की महत्ता बताई। जलाना से पढ़िए अभिषेक पाटिल की यह खबर…


जालना। आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज अपने गुरु आचार्य श्री विरागसागर जी की समाधि स्थली जालना पहुंचे तो भावुक हो गए। आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने पंचकल्याणक में अपने प्रवचन में कहा कि 9 अप्रैल को महामंत्र णमोकार का पाठ पूरे विश्व में गूंजेगा।

जालना धर्मसभा में आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि 84 लाख मंत्रों का महामंत्र ‘णमोकार महामंत्र’ है। णमोकार महामंत्र से 84 लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है। देवों में महान देव अरहंत देव होते हैं। ज्ञान में महान केवलज्ञान है। गुरु में महान गुरु निर्ग्रन्थ गुरु हैं। शास्त्रों में महानशास्त्र सिद्धांत शास्त्र है। उसी प्रकार मंत्रों में महान मंत्र णमोकार मंत्र है।

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।

णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा का मंत्र है। प्राकृत में इसे णमोकार मंत्र कहते हैं। संस्कृत में इसे नमस्कार मंत्र कहते हैं। हिन्दी में इसी का अपभ्रंश नाम नवकार मंत्र है। इस मंत्र के अनेक नाम हैं। इनमें प्रमुख हैं-पंच नमस्कार मंत्र, महामंत्र, अपराजित मंत्र, मूलमंत्र, मंत्रराज, अनादिनिधन मंत्र, मंगल मंत्र आदि।

इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है

(1) पंच नमस्कार मंत्र:-

जो परम पद (मोक्ष) प्राप्त कर चुके हैं अथवा उस मार्ग पर अग्रसर हैं, ऐसे पांच परमेष्ठियों को इस मंत्र में नमस्कार किया गया है, अत: इसे पंच नमस्कार मंत्र कहते हैं।

(2) महामंत्र अपराजित मंत्र:-

तीनों लोकों में इस मंत्र के समान कोई मंत्र नहीं है। आचार्य उमास्वामी ने णमोकार मंत्र स्तोत्र में कहा है कि तराजू के एक पलड़े में णमोकार मंत्र और दूसरे में तीन लोक रख दें तो णमोकार मंत्र वाला पलड़ा ही भारी रहेगा। अत: इसे महामंत्र अथवा अपराजित मंत्र भी कहते हैं।

(3) मूलमंत्र-मंत्रराज:-

यह मंत्र संसार के सभी मंत्रों का जनक (मूल) है। इससे 84 लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है। अत: इसे मूल मंत्र अथवा मंत्रराज भी कहते हैं।

(4) अनादि निधन मंत्र:-

पांचों परमेष्ठी अनंत काल से होते आ रहे हैं और भविष्य में भी अनन्त काल तक होते रहेंगे। इस प्रकार इनका आदि भी नहीं है और अंत भी नहीं है। इस मंत्र को किसी ने बनाया नहीं है और न यह कभी नष्ट होगा। अतः यह अनादि-निधन मंत्र कहलाता है। वर्तमान काल की अपेक्षा से आचार्य भूतबलि और पुष्पदन्त ने इस मंत्र को जैनधर्म के महान् ग्रन्थ ‘षट्खण्डागम’ में सर्व प्रथम प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध किया।

(5) मंगल मंत्र:-

यह मंत्र पापों का नाश करने वाला व मंगल करने वाला है।

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