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विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2025 पर विशेष : पर्यावरण पुकारे…अब भी समय है!


विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक सतत और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। इसकी शुरुआत हमारे घर की चौखट से होती है। यह एक स्मरण है – प्रकृति हमें जीवन देती है, अब हमारा कर्तव्य है कि हम उसे बचाएं। हमें आज ही यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के रक्षक बनेंगे। इस अवसर पर पढ़िए डॉ. सुनील जैन ‘संचय’ का विशेष आलेख…


हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उसके संरक्षण हेतु सामूहिक प्रयासों को प्रेरित करने का एक वैश्विक अवसर है। 2025 में, जब हम इस दिवस को मना रहे हैं, तब पर्यावरणीय संकट पहले से कहीं अधिक गंभीर रूप ले चुका है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता की क्षति और संसाधनों का अत्यधिक दोहन मानवता के सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। यह दिन हमें न केवल इन संकटों की याद दिलाता है, बल्कि यह भी प्रेरित करता है कि हम धरती माता की रक्षा के लिए कौन-कौन से कदम उठा सकते हैं।

इस वर्ष, विश्व पर्यावरण दिवस 2025 की थीम है: “विश्व स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण का अंत”। यह प्लास्टिक कचरे की गंभीर समस्या से निपटने का एक वैश्विक संकल्प है। हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग दो-तिहाई केवल एक बार उपयोग के लिए होते हैं और शीघ्र ही कचरे में बदल जाते हैं। ये अल्पकालिक उपयोग की वस्तुएं नदियों और महासागरों को प्रदूषित करती हैं, हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाती हैं, और माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में जमा हो जाती हैं।

5 जून – यह दिन हर वर्ष हमें प्रकृति के साथ हमारे संबंध की स्मृति कराता है। यह केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि चेतना का एक विस्तार है – एक सामूहिक प्रतिज्ञा कि हम अपनी धरती के साथ हिंसा नहीं, सह-अस्तित्व का संबंध बनाएँ।

महात्मा गांधी ने कहा था:

“पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।”

ऋग्वेद में वर्णित है: “पृथ्वी हमारी माता है, हम इसके पुत्र हैं।”

थॉमस फुलर ने कहा: “हम तब तक पानी की कीमत नहीं समझते, जब तक कुआँ सूख न जाए।”

जैन दर्शन में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है: “पर्यावरण की रक्षा करना अहिंसा की सबसे सच्ची साधना है।”

वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य: संकट की आहटहम जिस तथाकथित विकास की दौड़ में शामिल हैं, वह कहीं न कहीं प्रकृति के विनाश से जुड़ी हुई है। उदाहरण स्वरूप: वनों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा चक्र असंतुलित हो गया है। औद्योगीकरण और वाहन उत्सर्जन ने वायु को विषैला बना दिया है।

प्लास्टिक कचरा और रासायनिक अपशिष्टों ने नदियों और समुद्रों को दूषित कर दिया है।

तेज़ी से होते शहरीकरण ने भूमि उपयोग का संतुलन बिगाड़ दिया है।

परिणामस्वरूप – प्राकृतिक आपदाएँ, जल संकट, तापमान वृद्धि, जैव विविधता का विनाश और महामारी जैसी स्थितियाँ लगातार बढ़ रही हैं।

एक काव्यांश में ये भाव कुछ यूँ व्यक्त होते हैं:

नदियाँ भी अब बहते-बहते थक गईं,

जंगलों की चीखें भी अब चुप रह गईं।

कृत्रिम विकास की अंधी इस दौड़ में,

हम अपनी जड़ें ही खुद से काट गए हैं कहीं।।

 समाधान की दिशा में व्यावहारिक पहल

पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, जन-सहयोग से ही संभव है। प्रत्येक व्यक्ति निम्नलिखित प्रयास कर सकता है:

– व्यक्तिगत स्तर पर:

घर के आसपास कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएँ और उसे जीवित रखें।

बिजली और पानी की बर्बादी को रोकें।

एकल-प्रयोग प्लास्टिक (Single-use plastic) से परहेज़ करें।

निजी वाहन का प्रयोग सीमित करें, कारपूल या सार्वजनिक परिवहन को अपनाएँ।

➤ सामाजिक स्तर पर:

सामूहिक सफाई अभियान और वृक्षारोपण कार्यक्रमों में भाग लें।

स्कूलों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा दें।

बच्चों को प्रकृति प्रेम की प्रेरणा दें – उन्हें “प्रकृति मित्र” बनाएँ।

प्रौद्योगिकी और अनुसंधान के स्तर पर:

सौर, पवन और जैविक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाएँ।

जल पुनर्चक्रण और वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहित करें।

पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों में निवेश करें।

भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण संरक्षण

भारत की प्राचीन परंपरा में प्रकृति को ईश्वरतुल्य माना गया है – ‘वृक्ष देवता’ से लेकर ‘नदी माँ’ तक की अवधारणाएँ इसकी पुष्टि करती हैं।

वेदों, उपनिषदों, जैन और बौद्ध साहित्य में प्रकृति के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व का स्पष्ट वर्णन मिलता है।

पंचमहाभूतों – पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश – की पूजा भारतीय संस्कृति में होती आई है।

जैन दर्शन के अनुसार जल, वायु, पृथ्वी और वनस्पति सभी में जीवन है; इसलिए इनका दुरुपयोग पाप है।

संयमित और संतुलित जीवनशैली ही पर्यावरण की रक्षा कर सकती है।

‘अहिंसा परमो धर्म:’ का सिद्धांत हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ हिंसा नहीं, सहजीवन आवश्यक है।

तीर्थंकरों और बुद्ध ने वृक्षों के नीचे ध्यान कर प्रकृति के संरक्षण का संदेश दिया।

जैन मुनि अपने आचरण से पर्यावरण रक्षा के आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

“परिग्रह परिमाण” की अवधारणा उपभोग को सीमित कर संतुलन की प्रेरणा देती है।

 धर्म और पर्यावरण – एक अभिन्न संबंध

भारतीय पूजा-पद्धतियों में तुलसी, पीपल, नीम, गंगा जल आदि का धार्मिक महत्व प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जैन मुनियों की पदयात्रा, मौन, अपरिग्रह और भोजन में चयनशीलता – पर्यावरण संरक्षण के उत्कृष्ट उपाय हैं।

प्रेरक तथ्य (2025 के परिप्रेक्ष्य में)

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर वर्ष लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है।

प्रति मिनट एक ट्रक प्लास्टिक समुद्र में गिराया जा रहा है।

वर्ष 2025 तक लगभग 2 अरब लोगों को स्वच्छ जल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

निष्कर्ष:

अब नहीं, तो कभी नहीं।

पृथ्वी हमसे कुछ नहीं माँगती – वह केवल संरक्षण चाहती है। अब समय है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को पुनः परिभाषित करें। प्रगति का अर्थ विनाश नहीं, सतत विकास है।

विश्व पर्यावरण दिवस हमें एक सतत और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। इसकी शुरुआत हमारे घर की चौखट से होती है।

यह एक स्मरण है – प्रकृति हमें जीवन देती है, अब हमारा कर्तव्य है कि हम उसे बचाएँ।

हमें आज ही यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के रक्षक बनेंगे।

क्योंकि स्वस्थ पर्यावरण ही, स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक संकल्प दिवस होना चाहिए।

“धरती है धरोहर, न इसे करो बर्बाद,

संरक्षण में ही है इसका असली संवाद।”

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