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विश्व गौरया दिवस आज : तकनीक का असर पड़ रहा है गौरैया पर


आज दुनिया भर में ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जा रहा है. यह हर साल 20 मार्च को होता है। दुनिया भर में गौरैया पक्षी की संख्या तेजी से घट रही है। ऐसे में इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के मकसद से ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जाता है। आज हमें गौरया की चहचहाहट सुनाई नहीं दे रही है। कैसे हो इनका संरक्षण इसी पर पढ़िए पर्यावरण प्रेमी और स्तंभकार डॉ सुनील जैन संचय का यह विशेष आलेख


गौरेया की घटती संख्या का मुख्य कारण है, भोजन-पानी की कमी और पेड़ों का कटान। बढ़ती मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने चिड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है। पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मिथाइल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं। मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।

गौरैया को विलुप्त होने से हम ऐसे बचा सकते हैं

यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। गौरैया को विलुप्त होने से बचाने के लिए हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।

गौरैया संरक्षण के उपाय

ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी ऑफ बर्डस द्वारा विश्व के विभिन्न देशों में किए गए अनुसंधान के आधार पर भारत और कई बड़े देशों में गौरैया को रेड लिस्ट कर दिया गया है जिसका अर्थ है कि यह पक्षी अब पूर्ण रूप से विलुप्ति की कगार पर है। गौरैया संरक्षण के लिए हम यही कर सकते हैं कि अपनी छत पर दाना-पानी रखें, अधिक से अधिक पेड़- पौधे लगाएं, उनके लिए कृत्रिम घोंसलों का निर्माण करें।
गौरैयों को इस तरह बचा सकते हैं :
1. गर्मी के दिनों में अपने घर की छत पर एक बर्तन में पानी भरकर रखें।
2. गौरैया को खाने के लिए कुछ अनाज छतों और पार्कों में रखें।
3. कीटनाशक का प्रयोग कम करें।
4. अपने वाहन को प्रदूषण मुक्त रखें।
5. हरियाली बढ़ाएं, छतों पर घोंसला बनाने के लिए कुछ जगह छोड़ें और उनके घोंसलों को नष्ट न करें।
गौरैया को फिर से बुलाने के लिए लोगों को अपने घरों में कुछ ऐसे स्थान उपलब्ध कराने चाहिए जहां वे आसानी से अपने घोंसले बना सकें और उनके अंडे तथा बच्चे हमलावर पक्षियों से सुरक्षित रह सकें।
गौरैया शहरों से तो लगभग लुप्त हो चुकी है तथा गांवों में भी इनके घरौंदे अपेक्षाकृत कम ही हैं। हमें इस चिड़िया को बचाने हेतु थोड़ा-सा प्रयास करना होगा। यदि हम यह कर सके तो क्या पता यह रूठा मेहमान हमारे घर -आँगन में फिर से फुदकने लगे। फिर से चूँ-चूँ की मधुर आवाज गूँजने लगे।
गौरैया जो कभी गांवों में हैंडपंप पर टपकते पानी से अठखेलियां करती नजर आती थी, कभी दीवार पर लगे आईने में चोंच बजाती थी। चीं चीं करती उस नन्ही गौरैया को देखकर बच्चे किलकारी मारा करते थे। वो गौरैया अब कभी-कभार ही दिखती है। शहर में तो छोड़िए गांवों में भी कम ही नजर आती हैं। हर घर में पाई जाने वाली ये नन्ही चिड़िया तेजी से कम हो रही है। ऐसे में गौरैया को बचाने के लिए पहल नहीं की गई तो वह सिर्फ किस्सा बन रह जाएंगी।
हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि गौरैया का गौरव लौटाएं, ताकि फिर आंगन व छत पर गौरैया फुदकती नजर आए।
प्रयास रंग ला रहे : गौरैया को बचाने के लिए बहुत से स्वयंसेवी संस्थाओं, संगठन अनेक वर्षों से इस दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं उनकी जागरूकता का फल दिखने लगा है हालांकि इस दिशा में बहुत कार्य करने की जरूरत है। जागरूकता का परिणाम है कि लोग छतों पर दाना, पानी के साथ ही घरों में एवं अन्य स्थानों पर घोसले आदि रखने लगे हैं।

किसी कवि की यह पंक्तियां प्रासंगिक हैं-
धीरे-धीरे यादें अब अवशेष रह गईं,
लुका-छिपी का खेल स्मृति-शेष रह गया।
ना रहा गांव, न रहा मुंडेर,
गौरेया कहानी के बीच रह गई।।

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