संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महाराज ने मालवीय रोड स्थित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में कहा कि जैसे प्रातःकाल प्रभातफेरी होती है, एक बालक धर्म ध्वजा लेकर आगे बढ़ता है। उसके हाथ से जैसे वह ध्वज गिरने को होता है कि तभी उसके पीछे से दूसरा बालक आगे आकर उसे मजबूती से थाम लेता है, यह प्रतीक मात्र वस्त्र का टुकड़ा नहीं, यह महापुरुषों के अभाव में भी यह आपके पूर्व इतिहास को बताता है। पढ़िए संजय जैन नायक और प्रणीत जैन की विशेष रिपोर्ट…
रायपुर। पुरातत्व राष्ट्र की निधि है। ऐसे राष्ट्र की निधि को सुरक्षित रखना चाहिये। राष्ट्र के लिये दिया गया धन कभी भी खाली नहीं जाता। वह राष्ट्र की सुरक्षा के लिये ही काम आता है। राष्ट्र ध्वज हो या धर्म ध्वज यह मात्र वस्त्र का टुकड़ा नहीं है, इसमें बहूत कुछ इतिहास छुपा हुआ है और इसी में भारत के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण है।
यह उद्गार संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महाराज ने मालवीय रोड स्थित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये। आचार्य श्री ने कहा कि जैसे प्रातःकाल प्रभातफेरी होती है, एक बालक धर्म ध्वजा लेकर आगे बढ़ता है। उसके हाथ से जैसे वह ध्वज गिरने को होता है कि तभी उसके पीछे से दूसरा बालक आगे आकर उसे मजबूती से थाम लेता है, यह प्रतीक मात्र वस्त्र का टुकड़ा नहीं, यह महापुरुषों के अभाव में भी यह आपके पूर्व इतिहास को बताता है।
उन्होंने संस्कारों की बात करते हुए कहा कि संस्कारों से ही आज का वह बालक कल का नागरिक होता है। यह धर्मायतन एक प्रकार से देश के लिये आवश्यक है। आपने जो अपनी संतान की जवाबदारी ली है, एक बार भले ही अपने लिये कम हो जाए लेकिन यह आप लोगों का कर्तव्य है कि आप आने वाली पीढ़ी को ऐसी शिक्षा दो कि वह न केवल आदर्श बालक बने बल्कि आदर्श बालक से एक आदर्श नागरिक बने और आदर्श नागरिक ही नहीं अपितु वह राष्ट्र के लिये समर्पित राष्ट्रपति बने।
उन्होंने उपस्थित सभी बंधुओं में राष्ट्रीय भावना जगाते हुये कहा कि देश क्या है? भारतीय संस्कृति में एक आदर्श पुरुष ही आदर्श नागरिक माना जाता है। आदर्श नागरिकों से ही यह देश आगे बढ़ता है और विशाल भावों से ही विशाल कार्य संपन्न होते हैं। वर्तमान समय में आधुनिक सामग्री से जो संत निवास बनाये जा रहे हैं, उनकी उम्र कम होती है, प्राचीन काल में संत निवास तो नहीं बनते थे बल्कि विशाल पाषाण के जिनालयों का निर्माण किया जाता था, जिनकी उम्र हजारों हजार वर्ष होती थी।
आप लोगों की दृष्टि भी यहां पर पाषाण का भव्य जिनालय बनाने की है, जिनकी उम्र कम से कम एक हजार वर्ष होगी। ऐसा स्थान संकुचित भावों से नहीं बल्कि विशाल भावों से विशाल आंगन में बनता है। जहां पर कोई भी संत आ जाए तो वह उनके दर्शन करे और भगवान का अभिषेक पूजन जाप विधान आदि करे तो स्थान छोटा न पड़े। उन्होंने रायपुर के जैन समाज को आशीर्वाद देते हुये कहा कि आप सभी लोग अपने आवश्यक कार्यों को करते हुये अपनी संतान को संस्कारित करने के लिये यह स्थान बनाने जा रहे हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि यह भारत है और यह ऐसे ही नहीं बचा है, तूफानों और आंधिओं के बीच में जहां अनेक प्रकार के प्राकृतिक प्रकोप आए लेकिन आज तक वह धर्म ध्वजा नीचे नहीं गिरी। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने ऐसा सिखाया है कि कभी मांगना नहीं, यदि राष्ट्र के लिये चाहिये तो पूरा का पूरा दे देना। राष्ट्र के लिये दिया गया धन कभी भी खाली नहीं जाता।
वह राष्ट्र की सुरक्षा के लिये ही काम आता है। उन्होंने कहा कि मजबूत भावनाओं और दृढ़ संकल्प के साथ इस स्थान पर जिनालय का निर्माण करो। हजारों हजार लोग उससे लभान्वित हों। उन्होंने कहा कि अपने धन का उपयोग गाढ़ करके नहीं बल्कि उसको जिनेन्द्र भगवान के चरणों में समर्पित कर दो। उन्होंने कहा कि ऐसे जिनालयों के निर्माण के साथ ही भारत मजबूती के साथ खड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐसा निर्माण करो कि वह जल्दी से जल्दी लोगों के सामने आ सके। आचार्य श्री ने हायकू कहते हुये कहा कि “भारत बसा उनसे जिनका घर कभी नबसा”।
दयोदय महासंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मालवीय रोड स्थित श्री आदिनाथ दि. जैन बड़ा मंदिर में एक बड़ा भू खंड पर 171 फीट का त्रिकाल चौबीसी जिनालय एवं सहस्त्रकूट जिनालय बनाने का भाव रायपुर के सकल दिगंबर जैन समाज को हुआ एवं बड़ा मंदिर टृस्ट कमेटी के माध्यम से उपरोक्त भाव आचार्य श्री के समक्ष रखा तो आचार्य श्री ने स्वीकृति देते हुये कहा कि अच्छे कार्य करने के लिये हम कभी न नहीं करते हैं।
आप लोगों ने जो भावना रखी है उसे मितव्ययिता के साथ पूर्ण करो। धर्म सभा में आज रायपुर ही नहीं अपितु संपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न अंचलों से एवं महा नगर के सभी जिनालय एवं कालोनियों से समाज बंधुओ ने आकर आचार्य श्री संघ के समक्ष अपने परिवार के साथ आकर अपने अपने दान की घोषणा की एवं श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद लिया। प्रवचन उपरांत गुरुदेव की आहार चर्या संपन्न हुई। आज का पड़गाहन एवं आहार कराने का सौभाग्य नरेन्द्र जैन गुरुकृपा, राजेश जैन रज्जन एवं प्रदीप जैन विश्वपरिवार को मिला। सभी लोगों ने उनके पुण्य की सराहना करते हुये बधाई दी।













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