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तप त्याग साधना और वात्सल्य मूर्ति गुरु माँ पूर्णमति माता जी: माता जी का जीवन तप, त्याग, समर्पण और सेवा का उत्कृष्ठ उदाहरण 


भारत वसुंधरा पर समय-समय पर अनेकानेक ऋषि मुनि तपस्वी दिव्य आत्माओं ने जन्म लेकर इस भूमि को धन्य किया है। जीवन को जीवंत किया है। नर से नारायण तीतर से तीर्थंकर पाषाण से परमात्मा फर्श से अर्श की दिव्य यात्रा का अमर संदेश प्रदान किया है। राणा प्रताप मीरा पन्ना धाय के तप त्याग ओर साधना की पावन भूमि राजस्थान के बागड़ क्षेत्र के बांसवाड़ा जिले के अंतर्गत धर्म प्राण नगरी डूंगरपुर में वात्सल्य, करुणा, तप, त्याग ओर साधना की मूर्ति का जन्म हुआ। कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि का यह आलेख…


कोटा। भारत वसुंधरा पर समय-समय पर अनेकानेक ऋषि मुनि तपस्वी दिव्य आत्माओं ने जन्म लेकर इस भूमि को धन्य किया है। जीवन को जीवंत किया है। नर से नारायण तीतर से तीर्थंकर पाषाण से परमात्मा फर्श से अर्श की दिव्य यात्रा का अमर संदेश प्रदान किया है। राणा प्रताप मीरा पन्ना धाय के तप त्याग ओर साधना की पावन भूमि राजस्थान के बागड़ क्षेत्र के बांसवाड़ा जिले के अंतर्गत धर्म प्राण नगरी डूंगरपुर में वात्सल्य, करुणा, तप, त्याग ओर साधना की मूर्ति का जन्म हुआ। जिससे संपूर्ण राजस्थान के गौरव शाली इतिहास में चार चांद लग गए। देव शास्त्र गुरु के परम भक्त अमृत लाल जैन धर्मनिष्ठ रुक्मणि जैन के घर आंगन में अक्षय तृतीया के पावन सुअवसर पर 14 मई 1964 के दिन जन्म हुआ। कहते है कि पुण्य शाली जीव जब आता है तो उससे पहले उसका पुण्य आगे आगे चलता है। जी हां श्राविका माता रुक्मणि जी को गर्भ काल में स्वप्न में तीर्थ राज सम्मेद शिखर की वंदना के भाव और तीर्थंकरों की मनोहारी प्रतिमाओं के दर्शन होने लगे थे।

बचपन से ही आपकी वाणी में वीणा के तार झंकृत होने की वजह से आपका नाम वीणा रखा गया। आपने मात्र 6 वर्ष की अल्प आयु में ही ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था। जो कि बहुत बड़ी बात है। आपने आचार्य भगवंत से तीर्थ क्षेत्र कुंडलपुर में 7 अगस्त 1989 को आर्यिका दीक्षा अंगीकार कर पूर्णमति नाम को सार्थक किया। आपने कुंडलपुर विधान, श्री शांति नाथ विधान आदि कई विधानों की रचना की है। श्रद्धालगण बड़े भक्ति भाव और श्रद्धा से विधान करते हैं। आप जीभ से नहीं हृदय से बोलती हैं। आप ज्ञान, रस, तप, भाव आत्म सौंदर्य कला और साहित्य की समन्वय की साक्षात मूर्ति हैं। पूर्णमति माताजी अपने प्रवचनों, लेखन भजनों और धार्मिक कार्यों के माध्यम से जैन धर्म का प्रचार प्रसार करती हैं।

पूर्णमति माता जी का जीवन तप, त्याग, समर्पण और सेवा का उत्कृष्ठ उदाहरण है। आपको वात्सल्य मूर्ति के नाम से भी जाना जाता है। आप जब धारा प्रवाह बोलती है तो श्रद्धालगण एकाग्रता से आपकी वाणी को सुनकर हृदय में धारण करते हैं। आप मधुर स्वर में जब आध्यात्मिक भजन सुनाती हैं तब श्रद्धालु भाव विभोर हो झूमने लग जाते हैं। आपका भव्य ऐतिहासिक वर्षायोग कोटा राजस्थान में आलोकित अपूर्व अनुपम धर्म प्रभावना एवं हर्षाैल्लास के साथ हुआ। उस पूरे वर्षायोग में मुझे विभिन्न धार्मिक आयोजनों के समाचार लिखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ये मेरे जीवन का स्वर्णिम अवसर था। आज भी मेरी 35 वर्षों की कवरेज फाइल में समस्त वर्षायोग की प्रिंट मीडिया कवरेज उपलब्ध है। आपकी धर्मसभा में मुझको कई बार मंगलाचरण करने का अवसर भी मिला था।

आपका जो आशीर्वाद वात्सल्य करुणा मुझे मिली उसको जीवन की अंतिम सांस तक कभी नहीं भुला पाऊंगा। वर्ष 2025 का। पावन वर्षायोग आपका भारत की राजधानी दिल वालों की नगरी दिल्ली में भव्यता के साथ हर्षाैल्लास के वातावरण में चल रहा है। मैं आपके बारे में क्या लिखूं मेरे शब्द कोश में शब्द नहीं है। आपके बारे में लिखना सूर्य को दीपक की रोशनी दिखाने के बराबर होगा। आपके पावन चरणों में भाव पूर्ण वंदनामी वंदनामी वंदनामी। मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवांे से नित्य रहे दिन दुखी जीवांे पर मेरे उर से करुणा स्तोत्र बहे।

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