कष्ट दुःख असाता को भी समता भाव पूर्वक सहन करने से साता वेदनी कर्म का ही वंद होता है। ऐसा नहीं है कि आप दुख दारुणय कष्टों को समता भाव पूर्वक सहते जा रहे हैं फिर...
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गृहस्थ जीवन में रहते हुए व्यक्ति जीवन यापन के संसाधनों को जुटाने में इतना व्यस्त हो जाता है कि सब कुछ भूल जाता है। उसे अपने स्वरूप का, जगत का ज्ञान ही नहीं...








