यदि पुण्य को पाप में लगाओगे तो यह पुण्य क्षीण होता चला जाएगा और जो दिख रहा है, वह भी सब हाथ से निकल जाएगा। जिस निगोद नरक से यह यात्रा प्रारंभ हुई थी फिर वहीं...
Tag - मुनि श्री प्रमाणसागर जी
निःस्वार्थ भाव से दिया गया दान सच्चा और प्रभावी होता है। जिससे दानदाता को व्यक्तिगत संतुष्टि मिलती है। उदारता और करुणा का विकास होता है तथा अहंकार का विनाश...
जैनधर्म में पांच परमेष्ठियों का विशेष महत्त्व है । पांचों परमेष्ठियों में आचार्य तीसरे नंबर के परमेष्ठी हैं। जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हैं और शिष्यों से...








