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आत्मा में लीन होने पर बाहरी सुख फीका लगता है-स्वस्तिभूषण माताजी: धर्मसभा में दिए प्रवचन


इसी आकर्षण से संसार का बाजार चल रहा है । यदि इस आकर्षण को हटा दिया जाए तो बाजार खत्म हो जाएगा। तुम सामान के रंग, रूप, डिजाइन, स्वाद आदि को देखकर उसकी तरफ आकर्षित होकर उसे खरीदते हो । लेकिन जब अपनी आत्मा से जुड़ोगे, आत्मा स्वरूप निहारोगे तो वाहर के रूप की तरफ का आकर्षण खत्म हो जाएगा। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…


ग्वालियर। द्रव्य परिवर्तन यानी संसार में जितना सोना चांदी है, हीरा पन्ना हैं, माणिक मोती है, भोजन है ये सब पदार्थ भोगकर छोड़ चुके हैं। लेकिन संतुष्टि नहीं मिली। तृष्णा और बढ़ती जा रही है। भगवान महावीर स्वामी ने अपने केवलज्ञान में देखकर हमें बताया है। इसके पश्चात हमने क्षेत्र परिवर्तन किया। सुमेरु पर्वत के नीचे आठ मध्य स्थान उन पर जन्म लेना शुरू किया तो आकाश के समस्त प्रदेशों में जन्म लिया। आकाश जो खाली नजर आ रहा है, इसमें पंक्तिबद्ध हैं, इसके प्रदेश प्रत्येक क्रम से हैं। दिखने में हमें एक साथ दिखता है। विश्व में कोई स्थान ऐसा नहीं हैं जहां हमने जन्म न लिया हो, जहां हम न गए हों। आज हम देश विदेश घूमने जाते हैं। क्या देखने जा रहे हो ? जहां जा रहे हो, वहां अनेकोंबार जन्म ले चुके हो। लेकिन आकाश प्रदेशों में घूमने की तृष्णा खत्म नहीं हुई । कोई क्षेत्र नया नहीं हैं, कुछ भी अनदेखा नहीं हैं, सब कुछ देख चुके हैं । बस एक चीज नहीं देखी, उसका नाम है स्वयं की आत्मा।

यह विचार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने चम्पाबाग जैन धर्मशाला ग्वालियर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये । स्वस्तिधाम प्रणेत्री गुरुमां ने भक्तों को उद्वोधन देते हुए कहाकि राजमहल हो या ताजमहल या बर्फ के पहाड़ हों, जो सब जगह एकसे होते हैं । क्या देखने जा रहे हो, पानी या हरियाली या सीमेंट पत्थर से बनी इमारतें । सबकुछ एक जैसा है । बस उसे अलग अलग आकार और डिजाइन में बना दिया गया है । है तो धरती से मिलने वाली चीज । लोहा, सीमेंट, रेत, कंक्रीट से इमारत बनती है, वही इमारतें सब जगह मिलती हैं । उसमें जो कलर किये हैं वह भी इसी धरती से मिलते हैं । प्रकाश या रोशनी के लिए जो लाइट लगी है वह भी इसी पानी, अग्नि से बनी ऊर्जा है । बस इंसान ने उसे सेटिंग से बना दिया है और लोगों ने उड़े बंडर मानके देखना शुरू कर दिया है ।

इसी आकर्षण से संसार का बाजार चल रहा है । यदि इस आकर्षण को हटा दिया जाए तो बाजार खत्म हो जाएगा । तुम सामान के रंग, रूप, डिजाइन, स्वाद आदि को देखकर उसकी तरफ आकर्षित होकर उसे खरीदते हो । लेकिन जब अपनी आत्मा से जुड़ोगे, आत्मा स्वरूप निहारोगे तो वाहर के रूप की तरफ का आकर्षण खत्म हो जाएगा । जब आत्मा में सुख, आत्मा से लेने लगोगे तो वाहर की बस्तुएँ नीरस और फीकी लगने लगेंगी ।

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