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आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने दी दीक्षा: सुशील जैन बने मुनि सहज सागर जी महाराज और पंडित दीपचंद जैन बने नवपद्म सागर जी महाराज


उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्यश्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज के सन्निध्य में मंदिर जी में चल रहे कुंजवन महोत्सव में प्रातः काल नियमित जाप, अभिषेक, शांतिधारा, नित्यपूजा के साथ शांतिहवन की क्रियाएं हुईं। इस अवसर पर भव्य जैनेश्वरी दीक्षा भी दीक्षार्थियों को प्रदान की गई। पढ़िए राज कुमार अजमेरा की विशेष रिपोर्ट…


कुंजवन उदगांव/कोडरमा। दीक्षा कोई साधारण बात नहीं है। संसार के वैभव से विरक्ति का यह वह भाव है जिसमें मन को साधना होता है। इंद्रियों को वश में करना होता है। भगवान महावीर की कठिन तपश्चर्या के मार्ग पर चलना होता है। आत्मा को साधना होता है। आत्मा को परमात्मा बनाना होता है। इस कठिन मार्ग पर चलने को सहज ही कोई तैयार नहीं होता, यह तप त्याग तपस्या का यह कठिन मार्ग है। ऐसी भव्य जैनेश्वरी दीक्षा के शुभावसर पर जैन धर्म की प्रभावना के लिए उदगांव का जन-जन तैयार है। उदगांव भी भगवान महावीर की श्रवण संस्कृति के संवाहक के लिए महक उठा है, भक्तगण भी चहक उठे हैं।

उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्यश्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज के सन्निध्य में मंदिर जी में चल रहे कुंजवन महोत्सव में प्रातः काल नियमित जाप, अभिषेक, शांतिधारा, नित्यपूजा के साथ शांतिहवन की क्रियाएं हुईं। इस दौरान 56 कुमारिकाएं जुलूस के रूप घटयात्रा में शामिल हुईं। सौधर्म इंद्र ने ऐरावत हाथी पर सवार होकर कोशम्बी नगर के लिए प्रस्थान किया।

निकला भव्य जुलूस

कुंजवन महोत्सव में आज का दिन बेहद खास था। एक हजार वर्ष के इतिहास को बदलने का था, धर्म आराधना, जिन दर्शन की पावन भावना को भाने का था। प्रातः काल में होने वाली क्रियाओं के साथ ही आज हाथी पर सवार इंद्र इत्यादि देवों के जुलूस की आभा निराली थी। जुलूस में जैन धर्म के नारों का उद्घोष करते युवाओं का उल्लास लोगों को जोश से सराबोर करता रहा।

वैराग्य पथ पर गमन

जुलूस नगर भ्रमण के साथ ही पूर्ण होने के बाद भव्य जैनेश्वरी दीक्षा की तैयारियां शुरू हो गईं। सुशील जैन बने मुनि सहज सागर जी महाराज और पंडित दीपचंद जैन बने नवपद्म सागर जी महाराज बने। उत्कृष्ट सिंहनिष्कीडित व्रतकर्ता-साधना महोदधि अन्तर्मना आचार्यश्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज के मुख से खिरते अलोकिक मंत्रों के साथ ही दीक्षा के लिए दीक्षार्थी भी तैयार हो गये थे। मंत्रों के साथ ही मौजूद हर व्यक्ति इस दीक्षा का साक्षी बनना चाहता था।

लोगों में भगवान महावीर के संयम पथ पर चलने वाले दीक्षार्थियों के प्रति राग उत्पन्न हो रहा था। यह राग था वीतरागिता का, यह राग था भगवान महावीर के पथ पर चलने का, आनादिकाल से चली आ रही परंपरा का, भगवान श्रृषभ देव से भगवान महावीर तक 24 तीर्थंकरों से प्रवाहित हो रही अमिट साधना का और वह वक्त आ गया, जब दीक्षार्थी ने जन समुदाय के बीच उपस्थित होकर एक-एक कर अपने संपूर्ण वस्त्रों का त्याग करना शुरू कर दिया। लौकिक जगत को छोड़ कर उसने आलौकिक जगत का दमन थाम लिया। जीवन में कुछ पाने के लिए नहीं अपितु सभी कुछ त्यागने के लिए अनूठा अनोखा पथ अपना लिया।

कोई लालसा अब बाकी न रही, कोई भाव अब पाने का नहीं रहा। वैराग्य के पथ पर एक नई इबारत को लिखने का संकल्प लेकर तप त्याग संयम के प्रति बिना किसी संकोच के कठिन दुर्गम पथ को अपना लिया। अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने दीक्षार्थी के सिर पर स्वास्तिक की रचना कर सभी क्रियाओं को पूर्ण कराया। इसके साथ ही महाव्रत संस्कार महोत्सव की की भव्यता से उदगांव महक उठा, इस महक की सुंगध में हर कोई तृप्त हो गया।

जन्माभिषेक कार्यक्रम हुआ

इससे पूर्व धूली कलशाभिषेक किया गया। पांडुक शिला पर प्रभु का जन्माभिषेक कार्यकम हुआ, संध्याकाल में आनंद यात्रा में भक्त एक बार फिर भक्तिरस में झूम उठे, नाचने लगे। तरह-तरह से अपने भावों को व्यक्त कर धर्म रस को भाने लगे। रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही, इसमें भगवान को पालना झुलाने के लिए भक्तों की भक्ति की आतुरता बनी रही।

अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज के ओजपूर्ण प्रवचनों ने लोगों की भक्ति को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया। रात्रि प्रभु भक्ति में लीन भक्तों ने इन सभी कार्यक्रमों के माध्यम से प्रभु के प्रति अपनी कृतज्ञाता को प्रकट किया। कार्यक्रम आयोजक श्री ब्रह्मनाथ पुरातन दिगंबर जैन मंदिर टस्ट कुंजवन उदगांव रहा। बीपीवी मीडिया ग्रुप द्वारा सभी व्यस्थाओं का शानदार तरीके दायित्व निभाया जा रहा है।

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