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केवल त्याग में है सुख – मुनि श्री सुधासागर महाराज

ललितपुर. राजीव सिंघई। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने दैनिक प्रवचनों के माध्यम से उपदेश देते हुए कहा कि संसार मे पूर्णता किसी को भी प्राप्त नही है बल्कि यूं कहे कि ऐसा कोई भी व्यक्ति नही है, जो यह कह सके कि सारे काम मेरे मन के हो रहे हैं और मुझे जिंदगी का बहुत मजा आ रहा है।

यहां तक कि भगवान भी इसी गिनती में आएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी में भी ऐसे कई काम हुए हैं, जो वे नहीं जानते थे। सीता का अपहरण और रावण से युद्ध एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति ज्योतिष पढ़ लौट कर घर जा रहा था। रास्ते में उसे नदी किनारे पैर के निशान दिखाई दिए, जिन्हें देखकर उसने कहा कि मुझे लगता है यह पैर के निशान जिस व्यक्ति के भी हैं, वह व्यक्ति इस संसार का सबसे बड़ा आदमी होगा।

बहुत बड़ा राजा चक्रवर्ती से कम नहीं होगा। वह व्यक्ति अपने ज्ञान की परीक्षा करने के लिये वह उस व्यक्ति की खोज करते-करते उस स्थान पर पहुंच गया जहां चरणों के निशान उसे ले जा रहे थे। जब वह वहां पहुंचा तो उसने माथा फोड़ लिया देखा तो वहां एक संत विराजमान थे। संत ने जब उसे ऐसी अवस्था में देखा तो उससे पूछा कि क्या हुआ।

उसने बताया, मैं ज्योतिषी बन कर लौटा हूं और आपके पैरों के निशान के आधार पर समझा हूं कि यह चक्रवर्ती के पैर हैं मगर मुझे लगता है कि मैं फेल हो गया हूं। तब संत बोले, मैं चक्रवर्ती ही हू मगर इतना सुख मुझे तब नहीं मिला, जब मेरे पास धन वैभव और बड़ा परिवार था, जितना अब मिल रहा है।

जैसे ही मैंने सब त्यागा और संततत्व धारण कर लिया, मैं बहुत सुखी हो गया। इसका मतलब तो यह है कि संसार में सुख केवल त्याग में है। दूसरे प्रसंग में गुरुदेव ने कहा कि एक महिला नास्तिक थी। अपने आस्तिक पति के कहने पर मन्दिर पहुंची और पति के साथ पूजन में खड़ी हो गयी।

जब उसने पूजन की पंक्तियों को पढ़ा तो घर आकर बोली, अब खाना और मेरी तो तुम्हें कोई आवश्यकता नही होनी चाहिये क्योंकि तुम पूजा कर रहे थे और उस पूजा में लिखा था, क्षुधा रोग विनाशनाय, काम वाण विनाशनाय, इसे गुरुदेव ने स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि आप मन्दिर में पूजा करते हैं और घर में रोटी खाते हैं तो दुनिया की नजर में /नास्तिक की नजर में परस्पर विरोधी कार्य कर रहे हैं।

समन्तभद्र आचार्य कहते हैं कि तुमने जो नियम ले लिया है और तुम्हारे दोस्त नियम से रिक्त हैं और अवसर आने पर एक साथ खड़े होकर तुम्हें चिढ़ा रहे हैं, हंसी उड़ा रहे हैं तो उस समय तुम्हारे नियम के प्रति तुम्हारे क्या भाव आ रहे हैं, बस वही तुम्हारे नियम का पुण्य है। यदि रात्रि भोजन का त्याग है और तुम्हें देखकर कोई दूसरा त्याग कर देता है तो तुम्हारे त्याग में अतिशय है। आज की दुनिया में ऐसे तो कई लोग हैं जो बुराई की ओर जल्दी झुक जाते हैं जबकि ऐसे लोगों की गिनती उंगलियों पर हैं, जिन्हें देखकर दूसरा व्यक्ति नियम ले सके।

मुनि श्री ने कहा कि आज हमारी श्रद्धा बहुत कमजोर हो गयी है। हम दूसरों की बुराई देखकर अपनी अच्छाई को छोड़ने तैयार हो जाते हैं। जैसे रात में होटल पहुंचे, सभी खाना खा रहे थे सो हम भी खाने लगे जबकि त्याग था।

दोस्त झरने पर नहाने जा रहे थे तो हम भी चले गए जबकि वह समय अभिषेक करने जाने का था यानी अभिषेक छोड़ दिया। जब तक हम अपना श्रद्धा भाव मजबूत नहीं करेंगे, अपने नियम से च्युत होते रहेंगे, गुरु और भगवान को झूठा करार देते रहेंगे। अतिशय चमत्कार को झूठा कहने लगेंगे।

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