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जैन साधु चलते- फिरते भगवान : ऐसे होते हैं दिगम्बर जैन साधु-संत-डॉ. अरविंद जैन


जैन साधु के प्रति सारा विश्व नतमस्तक क्यों होता है? जैन साधु की कुछ विशेषताओं पर महावीर सर्वोदय मासिक पत्रिका के संपादक एवं अखिल भारतीय जैन संपादक संघ के अध्यक्ष श्री अरविंद जी जैन प्रकाश डाल रहे हैं। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…


जयपुर। आज जैन मुनि की निर्मम हत्या से जैन समाज ही नहीं, पूरा देश- विदेश स्तब्ध, निशब्द एवं शोक मग्न है। महा अहिंसक की इस प्रकार से महा हिंसक तरीके से हत्या होना असाधारण घटना है। जैन साधु के प्रति सारा विश्व नतमस्तक क्यों होता है? आइये इस प्रसंग में जैन साधु की कुछ विशेषताओं पर महावीर सर्वोदय मासिक पत्रिका के संपादक एवं अखिल भारतीय जैन संपादक संघ के अध्यक्ष श्री अरविंद जी जैन प्रकाश डाल रहे हैं-

नग्नत्व- जैन साधु तन पर एक धागा मात्र भी नहीं रखते, बालकवत् निर्विकार हो सदा नग्न रहते हैं। सर्दी, गर्मी एवं बरसात में भी कपडा धारण नहीं करते हैं, ये त्याग की पराकाष्ठा है।

अहिंसा पिच्छी- अहिंसा की पालना हेतु एक अहिंसा मोर पंख पिच्छी रखते हैं ताकि बैठने, सोने आदि कार्यों में जीव जन्तुओं से बचाने के लिए पिच्छी से जगह को प्रासुक किया जा सके। आशीर्वाद या सर्दी- गर्मी से बचने के प्रयोग नहीं करते हैं।
शुद्धि कमण्डलु -जैन साधु एक कमण्डलु रखते हैं जिसका पानी मल- मूत्र शुद्धि के समय काम में आता है। वे इस पानी को पीने के कार्य में नहीं लेते हैं।

पद विहारी- जैन साधु सदा पैदल चलते हैं वो भी विना जूते चप्पल के, चाहे कितनी ही सर्दी या गर्मी हो।
नितय विहारी – जैन साधु नियत विहारी होते हैं। एक स्थान पर ज्यादा दिन नहीं रुकते हैं। चौमासा या विशेष अनुष्ठान हो तो उसको छोड़कर।
आहार चर्या – दिन में एक बार, एक स्थान पर खडे होकर आहार -पानी लेते हैं। 24 घंटे में एक बार दिन में ही आहार, पानी लेते हैं, वो भी नियम मिलने पर। अगर अन्तराय आ जाए तो उस दिन का आहार त्याग होता है।

कर पात्री- जैन साधु खडे़ होकर हाथों में ही आहार, पानी लेते हैं, बैठकर या बर्तन आदि में नहीं लेते हैं। आर्यिका माताजी बैठकर हाथों में एवं उनसे छोटे पद धारी कटोरे में लेते हैं।
हाथ से केशलोच- सभी जैन साधु और माताजी हाथों से ही बाल निकालते हैं। ब्लेड , मशीन या उस्तरे से नहीं कटवाते हैं। अधिकतम तीन माह में एक बार केशलोच करते ही हैं ताकि बालों में जीव आदि पैदा ना हों।

आजीवन अस्नान- जैन साधु का शरीर से निर्ममत्व होता है, ना वे उसका किसी प्रकार से श्रृंगार करते हैं, ना स्नान ही करते हैं।
अल्पनिद्रा – अल्पभोजी और निस्पृह होने के कारण रात्रि में अल्प समय ही नींद लेते हैं। सदा प्रमाद रहित होते हैं।
आजीवन अदन्त धोवन- जैन साधु आहार लेने के बाद दांतों को उसी समय अच्छी तरह से साफ कर लेते हैं क्योंकि वे कभी भी दन्तमंजन नहीं करते। फिर भी संयम के प्रभाव कभी बदबू नहीं आती है।

भू शयन- भूमि पर या लकड़ी के पाटे पर शयन करते हैं, गद्दे, रजाई, तकिया आदि साधनों का प्रयोग नहीं करते हैं।
उपसर्ग परिषह जय- प्राकृतिक, मानवीय या जानवरों द्वारा किसी प्रकार उपसर्ग आ जावे तो वे समता भाव से सहन करते हैं। ना वे उसका प्रतिरोध करते हैं, ना स्वयं निवारण करते है। मरण प्रंसग बन जाए तो समाधि धारण कर लेते हैं। यह साधु की उत्कृष्ट परीक्षा का समय होता है। इसके अलावा वे स्वयं 22 प्रकार परिषहों की सहन कर आत्मा को मजवूत बनाने के लिए परिषह तप करते हैं।

दैनिक षडावश्यक- जैन मुनि के दैनिक छह आवश्यक कार्य होते हैं जिसे समय पर नियम पूर्वक करते हैं – सामायिक, स्तुति, देव वंदना, स्वाधाय, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग।
पंचेंन्द्रिय विजय- स्पर्शन आदि पांचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होते हैं।

पंच समिति- 1. चार हाथ भूमि देखकर चलना, 2.हित मित प्रिय वचन (केवल मोक्षमार्ग संबंधी), 3. 46 दोषों से रहित विना याचना से अनुद्दिष्ट आहार ग्रहण करना। आहार तप बढ़ाने के लिए होता है, शरीर पोषण हेतु नहीं। 4. किसी वस्तु को उठाने या रखने में पूर्ण सावधानी से पिच्छी से मार्जन करते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हिंसा ना हो। छाया- धूप में आते जाते समय में शरीर को भी मार्जन करते हैं ताकि शरीराश्रित सर्दी – गर्मी के जीवों का प्रतिकूल वातावरण में घात ना हो, 5. मल-मूत्र के स्थान को भी देख भालकर जीव दया पालते हैं।

पंच महाव्रत- जैन साधु के पंच महाव्रत मुख्य होते हैं, शेष कार्य इन्हीं की सिद्धि के लिए होते हैं। 1.अहिंसा – सभी प्रकार के त्रस- स्थावर जीवों की हिंसा का त्याग। 2. सत्य- सभी प्रकार के असत्य वचन बोलने का त्याग। 3. अचौर्य- बिना दिये किसी वस्तु को नहीं ले चाहे पानी, मिट्टी ही क्यों ना हो। 4. ब्रह्मचर्य- द्रव्य एवं भाव सभी प्रकार से कुशील सेवन का त्याग। 5.अपरिग्रह* – 24 प्रकार के सभी परिग्रहों का त्याग होता है। पिच्छी, कमण्डलु एवं एक शास्त्र ये तीन वस्तु ही अपने पास रख सकते हैं। किसी भी प्रकार के आरंभ एवं परिग्रह रखने, उपार्जन करने, संग्रहण करने का ना आदेश देते हैं, ना उपदेश देते हैं। वे ना तो राजनैतिक पद लेते है, ना सामाजिक पद या जिम्मेदारी। सब प्रकार के आरंभ एवं परिग्रह में अनुमति एवं अनुमोदना के त्यागी होते हैं।

इस प्रकार 28 मूलगुणों एवं अनेक दश धर्म, बारह भावना, परिषह जय, उपसर्ग विजय, विशिष्ट तप आदि उत्तर गुणों को धारण करने वाले दिगम्बर जैन मुनि/ साधु होते हैं। तप के प्रभाव से अनेक ऋद्धि एवं सिद्धियां उन्हें प्रकट हो जाती हैं लेकिन वे उन्हें ना तो स्वीकारते हैं, ना उनका उपयोग करते हैं। जन कल्याण या धर्म रक्षा हेतु कदाचित प्रयोग करना पड़े तो वे उसका योग्य प्रायश्चित लेते हैं। वे सदा अपने ज्ञान, ध्यान एवं तप वृद्धि में लगे रहते हैं। उन्हें परोपकार की मुख्यता नहीं होती, आत्म कल्याण ही उनके लिए मुख्य होता है। वर्तमान में विशेष संहनन ना होने के कारण वे पूर्णत: वनवासी एवं उग्र तपों को नहीं कर पाते हैं लेकिन अपने 28 मूलगुणों को दोषरहित पालन करते हैं। कहीं दोष लगते हैं तो तत्काल आचार्य से योग्य प्रायश्चित मांगते हैं।

ऐसे जैन साधु चलते- फिरते भगवान हैं। जिनको णमोकार मंत्र में नमस्कार किया गया है। साधुओं से ही धर्म चलता है। बिना साधु बने मोक्ष नहीं मिलता है। साधु किसी भी धर्म का हो उसकी रक्षा का दायित्व समाज के साथ सरकार का भी है। सरकार/ प्रशासन को ऐसा सबक एवं संदेश देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसा जघन्य अपराध करने की कोई भी सोचे ना।`

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