समाचार

साइंस ऑफ लिविंग पर प्रवचन दे रहे हैं : संघर्ष भी सहर्ष स्वीकार करना चाहिए – मुनि श्री निरंजन सागर जी


मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जिस भी व्यक्ति ने संघर्षों को सहर्ष के साथ स्वीकार किया है, उस संघर्ष के काल में जिसने धैर्य को नहीं खोया, उसी व्यक्ति ने अपना जीवन सफल बनाया है। पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट…


कुण्डलपुर। साइंस ऑफ लिविंग के आज के सत्र में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि जीवन के विपरीत समय को किस तरह आनंद के साथ व्यतीत करना है। ज्ञात रहे कि किसी तरह पांडवों ने अपना अज्ञातवास का विपरीत काल व्यतीत किया। कई लोगों को लगता है कि इसमें क्या खास है। यह तो कथा -कहानी है। लेकिन अगर आप इस प्रसंग को मैनेजमेंट विजन (प्रबंधन की दृष्टि) से देखेंगे तो आपको यह प्रसंग बहुत बड़ा संदेशदायक दिखेगा। यह बात निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि हम सभी के जीवन में ऐसे प्रसंग कई बार आते हैं।

कई बार हम सभी को एक ऐसी परिस्थिति को महसूस करना पड़ता है, जिसे हम सभी नहीं चाहते। ऐसी परिस्थिति में हम बस एक ही प्रयास करते हैं कि येन- केन- प्रकारेण यह प्रतिकूल परिस्थिति हमारे अनुकूल बन जाए। जिस भी व्यक्ति ने संघर्षों को सहर्ष के साथ स्वीकार किया है, उस संघर्ष के काल में जिसने धैर्य को नहीं खोया, उसी व्यक्ति ने अपना जीवन सफल बनाया है। सही तैराक वही माना जाता है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी तैरना जानता हो। मुनि श्री ने कहा कि अनुकूल परिस्थितियों में तो सामान्य सा तैराक भी तैर लेता है।

एक महान राजवंश के उत्तराधिकारी थे पांडव, राजपुत्र थे, तब भी उनके साथ ऐसी परिस्थिति निर्मित हो गई। परिस्थिति का निर्मित होना महत्वपूर्ण बात नहीं है, वह तो किसी के भी साथ निर्मित हो सकती है। महत्वपूर्ण बात है उस परिस्थिति का सामना करना। पांडवों ने हिम्मत नहीं हारी और नतीजा सभी को भलीभांति अवगत है। विजय श्री ने पांडवों की चरण रज को शिरोधार्य किया। आपके जीवन में आई विपरीत परिस्थितियां संकेत हैं आपके महान बनने का। विश्व में जितने भी महान व्यक्ति हैं, उन्होंने उनके जीवन काल में आई विपरीत परिस्थिति का किस तरह धैर्य के साथ सामना किया, यह इतिहास हमें बतलाता है। ऐसे व्यक्ति ही इतिहास बनाते हैं। आपका जीवन भी विशेष तभी बनता है, जब आप कुछ विशेष करते हैं।

विशेषता के कारण ही वह सामान्य से अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। वे महान व्यक्ति हमारे लिए मिसाल बन जाते हैं। जिस-जिस व्यक्ति के जीवन में वन का संयोग मिला अर्थात वनवास मिला, उन-उन व्यक्तियों का आज अलग ही इतिहास है। जीवन (जी + वन) शब्द का अर्थ है जिसका जी अर्थात मन, वन अर्थात जंगल में भी लग जाए ऐसा जीवन ही मंगलमय बनता है। विपरीत परिस्थितियों में जिसने अपनी मन: स्थिति को संभाल लिया और धैर्य का संयम का परिचय दिया, वही आज इतिहास में उच्च स्थिति पर पहुंचा है। जिस युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता था, जिसने कभी किसी का अहित नहीं किया। ऐसे धर्मराज युधिष्ठिर को धर्म उपदेश देने वाला पुरोहित बनना पड़ा।

उन्होंने कहा कि जिसके एक इशारे पर स्वादिष्ट भोजन के थाल के थाल सामने आते थे, ऐसे महाबली भीम को भी रसोईया बनना पड़ा। अर्जुन के एक संकेत पर सैकड़ों नृतक-नृतकी मनोरंजन के लिए तुरंत आते थे, ऐसे पार्थ को भी नृत्य का प्रशिक्षण देने वाला ब्रह्न्नला बनना पड़ा। जो स्वयं एक श्रेष्ठ योद्धा है श्रेष्ठ घुड़सवार थे, उनके एक आदेश पर एक से बढ़कर एक घोड़े उनकी सवारी को हाजिर रहते थे। ऐसे नकुल कुमार को भी घुड़साल में सेवा करनी पड़ी। सैकड़ों गोशाला और करोड़ों गोवंश जिनके राज्य में जिनकी सेवा करते थे, ऐसे सहदेव को भी राजा का सेवक वन गायों की सेवा करनी पड़ी। क्या नहीं बीता पांडवों पर लेकिन उन्होंने संघर्ष किया वह भी हर्ष के साथ। विपरीत परिस्थितियों को सहना जिसने सीख लिया है, उसने जीवन को जीना सीख लिया है। मायने यह नहीं रखता कि आदमी कितना जिया, मायने रखता है आदमी कैसे जिया।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
3
+1
1
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page