पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज,मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागर महाराज 1008 भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। यहां पर नित्य पूजा के अलावा मुनिराज के प्रवचन हो रहे हैं। इसका लाभ यहां के समाज बंधु और धर्मानुरागी जन ले रहे हैं। नांद्रे (महाराष्ट्र ) से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की खबर…
नांद्रे (महाराष्ट्र )। पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज,मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागर महाराज 1008 भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं।
यहां पर नित्य पूजा के अलावा मुनिराज के प्रवचन हो रहे हैं। इसका लाभ यहां के समाज बंधु और धर्मानुरागी जन ले रहे हैं। प्रवचन के दौरान मुनि श्री सारस्वत सागर जी ने कहा कि कार्य आरंभ करो मार्ग खुलेगा। उन्होंने कहा कि जीवन में पाना और छोडना दोनों ही लगा रहता है। पाने में भी क्रिया का आरंभ करना पडता है तो छोडने में भी क्रिया का आरंभ करना पडता है। बिना आरंभ के न कुछ मिलता है, न कुछ छूटता है। जगत परेशान है कि आरंभ करें कैसे ? यदि नहीं हुआ तो यह ‘तो ‘ शब्द का भाव लोगों को परेशान किए है, भयभीत किए है, अनुत्साही किए है और समर्थ को असमर्थ किए है।
यदि आपको इन सारे विकलपों से मुक्त होना है तो कार्य को आरंभ कर दीजिए और धीरे – धीरे, संभल-संभलकर आगे बढ़ते जाइए। उत्साह के साथ विवेक और विवेक के साथ उत्साह को लेकर चलिए। कुछ समय के पश्चात आप पायेंगे कि आपका डर आपकी सोच में था, जब तक नहीं किया तब तक डर था और जैसे हि आरंभ किया साहस बढ़ता गया और डर भागता चला गया और सफलता का मार्ग खुलता गया।
पक्षी से मिली बालक को प्रेरणा
मुनि श्री ने कहा कि एक बालक था। उसको नदी के उस पार जाना था परंतु नदी को देखकर डर रहा था कि कैसे मैं पार कर पाऊंगा? बार-बार आगे बढता परंतु नदी में पैर नहीं रखता। तभी उसने आकाश में उड़ते पक्षी को देखा। वह पक्षी भी नदी के इस पार से उस पार जाना चाहता था परंतु इस पार से उस पार कि दूरी बहुत थी।
वह पक्षी उड़ते हुए गया और नदी के मध्य में कुछ समय के लिए पानी में ठहरा, फिर आगे बढ गया फिर ठहरकर आगे बढ गया और वह अंतत: मंजिल तक पहुंच ही गया। बालक यह सब देख रहा था, यह सब देखकर उसके अंदर हिम्मत आई और उसने भी नदी में तैरना आरंभ किया। पानी को काटता हुआ आगे बढ रहा था। भय भाग रहा था और साहस बढ़ रहा था। इसलिए कार्य का आरंभ करो। भय समाप्त हो जाएगा और साहस आपका बढ़ जाएगा।













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