मंथन पत्रिका

दोहों का रहस्य - 15 शरीर, माया और मन से मुक्ति की आवश्यकता सबसे ज्यादा जरूरी : शारीरिक सुखों और भौतिक मोह को त्याग कर ही आत्मिक शांति संभव है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की पंद्रहवीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“जब लग आश शरीर की, मृतक हुआ न जाए।

काया माया मन तजे, चौड़े रहा बजाय।”


कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से मनुष्य के जीवन का गूढ़ सत्य प्रकट कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक मनुष्य के अंदर शरीर के प्रति मोह, सांसारिक इच्छाएं (आश), और भौतिक सुखों का लोभ बना रहता है, तब तक मनुष्य का सारा जीवन शरीर (काया), सांसारिक माया (धन, संपत्ति, रिश्ते) और चंचल मन के अधीन होकर व्यर्थ चला जाता है। इनसे मुक्ति पाए बिना आध्यात्मिक उत्थान और वास्तविक आनंद संभव नहीं है।

‘चौड़े रहा बजाय’ का अर्थ है कि जब व्यक्ति शरीर, माया और मन की आसक्ति का त्याग कर देता है, तब वह सहज, शांत और आनंदमयी स्थिति में पहुंच जाता है। यह स्थिति आत्मिक मुक्ति की अवस्था है, जहां व्यक्ति बिना किसी चिंता, भय या मोह के पूर्ण संतोष का अनुभव करता है। इच्छाओं का त्याग तथा इच्छाओं का अंत ही सच्ची मुक्ति है।

शारीरिक सुखों और भौतिक मोह को त्याग कर ही आत्मिक शांति संभव है। मन के बंधनों को तोड़कर व्यक्ति एक निश्चिंत और आनंदित जीवन जी सकता है। अतः सांसारिक मोह-माया छोड़कर आत्म-कल्याण में निहित होना ही श्रेष्ठ है।

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