कई सालों से चली आ रही एक प्रथा अब बदलने की आवश्यकता है। जब किसी का स्वर्गवास हो जाता हैं तो सगे-संबंधी शाल/कपड़े मृतक को ओढाते हैं। शाल जिसका मूल्य 200 से 500 रुपए तक होता है। वह शाल आधे घंटे के बाद कुछ काम की नहीं रहती है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर । कई सालों से चली आ रही एक प्रथा अब बदलने की आवश्यकता है। जब किसी का स्वर्गवास हो जाता हैं तो सगे-संबंधी शाल/कपड़े मृतक को ओढाते हैं। शाल जिसका मूल्य 200 से 500 रुपए तक होता है। वह शाल आधे घंटे के बाद कुछ काम की नहीं रहती है। यह कहना है जैन राजनैतिक चेतना मंच भारत के राजेश जैन दद्दू का।
वे कहते हैं कि यह परंपरा जो वर्षों से चली आ रही है अब बदलने की जरूरत है। जिसके घर दुखद अवसान हुआ हो वहां परिवार की इजाजत से एक छोटा दान पात्र शव के पास रख देना चाहिए और शाल के पैसे उसमें डाल देने चाहिए । यदि जरूरी भी हो तो मृत देह को परिवार व ससुराल के पक्ष की केवल 2 शाल/कपड़े ओढाए जाएं। बाकी परिवारजन से शाल और कपड़े के नाम से आए पैसे से गाय को घास खिला दो या पंछी को दाना डाल दो या वह सारे पैसे इकट्ठे कर गौशाला या किसी अनाथ आश्रम को दान देने की शुरुआत हो। समाज को इस तरह के प्रस्ताव पर मनन करना चाहिए।













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