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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सानिध्य में हुआ आयोजन : अष्टानिक पर्व पर हुआ सिद्ध चक्र विधान

धरियावद। अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज और क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज के सानिध्य में श्री आदिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, नसियां में अष्टानिक पर्व के सिद्धचक्र विधान का आयोजन किया गया। विधान का प्रारंभ एक मार्च से हुआ था, जिसका समापन आठ मार्च को किया गया। इन आठ दिनों 2040 श्रीफल अर्घ्य भगवान को अर्पित किए गए।

तीन हवन कुंडों में आहुति

प्रतिदिन सुबह पांच बजे से शुरू होने वाले इस विधान के लिए रंगोली से मंडला बनाया गया था। उसके बीचों बीच में नदीश्वर दीप विराजमान किया गया। इसी के आस-पास 2040 श्रीफल अर्घ्य समर्पित किए गए। यहां तीर्थंकर, गणधर, सामान्य केवली नाम से तीन हवन कुंड बनाए गए थे। उसी में श्रावकों द्वारा धूप, घी से 1956 मंत्रों के साथ आहुति दी गई। विधान के अंतर्गत प्रतिदिन शाम को आरती का आयोजन किया गया।

साल में तीन बार अष्टानिक पर्व

साल में तीन बार अष्टनिक पर्व आता है। फागुन, आषाढ़, कार्तिक में शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक अष्टानिक पर्व आता है। सिद्धचक्र विधान करने के पीछे इतिहास है कि मैना सुंदरी के पति श्रीपाल सहित 700 लोगों को कुष्ठ रोग हो गया था। तब मैना सुंदरी ने मुनिराज के आशीर्वाद से विधान किया और श्रीफल सहित 700 लोगों का कुष्ठ रोग दूर हो गया। तभी इस विधान की महिमा अधिक हो गई।

सिद्ध भगवान का स्मरण 

विधान के पहले दिन 8, दूसरे दिन 16, तीसरे दिन 32,चौथे दिन 64,पांचवें दिन 128, छठे दिन 256, सातवें दिन 512 और आठवें दिन 1024 अर्घ समर्पित किए जाते हैं। इस तरह से कुल 2040 अर्घ्य चढ़ते हैं। इन अर्घ्यों में सिद्ध भगवान के गुणों का स्मरण किया जाता है और अगले दिन हवन के साथ समापन किया जाता है। इसके साथ ही भगवान का प्रतिदिन पंचामृत अभिषेक किया गया। विधान समापन पर महावीर वाखावत, राजेंद्र डागरिया, रितेश डागरिया, प्रदीप गांधी, संजय वकतावत, संदेश जैन, गौरव दोषी, राजेश सेठ, राजा दोषी, अभिलाषा गोवाड़िया, ममता दोषी, ममता, रानू जैन, रीना डागरिया, ममता जोदावत, दीपिका डागरिया, चेतना जैन, साधना डागरिया, कीर्ति गांधी सहित अनेक श्रावकों हवन किया और भगवान को अर्घ्य समर्पित किए।

मुनि श्री ने बताया महत्व

अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने विधान का महत्व बताते हुए कहा कि जितने अच्छे भाव, द्रव्य, समय, क्षेत्र आदि पवित्र होंगे, विधान का उतना अधिक फल मिलता है। श्रावकों की कर्म निर्जरा का एक साधन विधान, पूजन और आराधना भी है। इन सब को करने में असंख्यात कर्मों की निर्जरा होती है। यह अनुष्ठान नियम, संयम के साथ किया जाता है।

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