पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी के शिष्य मुनि अपूर्व सागर मुनि अर्पित सागर धरियावद विराजित हैं। रामनवमी के अवसर पर धर्म सभा में उपदेश में मुनि अपूर्व सागर ने बताया कि रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन नहीं जावे। इस बात को जीवन में श्रीराम ने चरितार्थ कर आदर्श एवं मर्यादा पुरुष के रूप में विश्व में विख्यात हुए रघुकुल कौशल्या के श्री राम का आज जन्म जयंती दिवस है, हमने दशरथ का नाम नहीं लिया कौशल्या का राम कहा क्योंकि वह ऐसी मां थी जिसने राम को संस्कारित किया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
धरियावद। पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी के शिष्य मुनि अपूर्व सागर मुनि अर्पित सागर धरियावद विराजित हैं। रामनवमी के अवसर पर धर्म सभा में उपदेश में मुनि अपूर्व सागर ने बताया कि रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन नहीं जावे। इस बात को जीवन में श्रीराम ने चरितार्थ कर आदर्श एवं मर्यादा पुरुष के रूप में विश्व में विख्यात हुए रघुकुल कौशल्या के श्री राम का आज जन्म जयंती दिवस है, हमने दशरथ का नाम नहीं लिया कौशल्या का राम कहा क्योंकि वह ऐसी मां थी जिसने राम को संस्कारित किया। उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। राम को आदर्श एवं मर्यादा पुरुष के रूप में विश्व जानता है। जिन पुरुषों का जीवन अनुकरणीय होता है, वे आदर्श पुरुष कहलाते हैं। मर्यादा पुरुष श्री राम में गुणों का भंडार था। संपूर्ण जीवन में अनेक गुण देखे गए हैं। भगवान का गुणानुवाद कठिन है। श्री राम न्यायवान, नीति वान, सदाचारी, संतोषी, मृदु भाषी, निस्पृही, सकारात्मक सोच रखने वाले आत्मज्ञानी, सज्जन, धैर्यवान आदर्श पुरुष थे। आज भारत के हर देश गांव में श्री राम का नारा लिखा है। मैं आज वीतरागी श्री राम की बात कर रहा हूं। धनुष बाण धारी श्री राम की बात नहीं कर रहा हूं। पवित्र न्यायवान मोक्ष गामी श्री राम का जन्म 1008 मुनि सुव्रतनाथ भगवान के समय हुआ है। वह मांगीतुंगी महाराष्ट्र से मोक्ष गए। मर्यादा पुरुष श्री राम के गुण ग्राही हैं। हमारे पास भी अनंत गुण शक्ति है। हम उनका उपयोग नहीं करते इस कारण हम अपने मंजिल तक नहीं पहुंच पाए।

खोने का दुख न करें
उन्होंने कहा कि श्री राम ने पिता की आज्ञा का, वचन की मर्यादा रख पालन किया, 14 वर्ष वनवास गए। राज्य सिंहासन पर केकई का भारत के प्रति राग होने से वह वन गए। गुणानुवाद इसलिए किया जाता है कि आप हम अपनी शक्ति पहचानें। अशुभ पाप कर्मों के उदय से पुण्य क्षीण कमजोर हो जाता है। इसलिए श्री राम को राज्य नहीं मिला और जिसका पुण्य प्रबल होता है उसे दूर की वस्तु भी मिल जाती है। हमारे साथ जो घटित हो रहा है, वह हमारे कर्मों के उदय के कारण हो रहा है। इष्ट, अनिष्ट में हमारा पुण्य- पाप काम करते हैं। अशोक जेठावत और नमन भैया अनुसार मुनि श्री ने बताया कि सकारात्मक सोच श्री राम में थी।
समय से पूर्व और भाग्य से ज्यादा किसी को मिलता नहीं है। श्री राम का चिंतन विचार मनन करने की जरूरत है। श्री राम जानते थे राज गद्दी स्थाई नहीं है। पूर्व जन्मों में भी हमने राज पाठ किया है। श्री राम घर में बैरागी थे। मुनि श्री ने सूत्र दिया कि किसी को भी गुस्से में निर्णय नहीं लेना चाहिए और खुशी में वादा नहीं करना चाहिए। दशरथ का खुशी में वादा केकई को जो किया था उस कारण श्री राम को राजपाठ का त्याग करना पड़ा। व्यक्ति को नियति हालात पर सब कुछ छोड़ देना चाहिए क्योंकि हमारे अशुभ भावों से हालात उत्पन्न होते हैं। जिनेन्द्र भगवान के धर्म को समझना चाहिए। हम कुछ भी लेकर नहीं आए थे, इस कारण उसके खोने का दुख नहीं करना चाहिए। खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाना है।
राज पाठ या पद किसी और का था , आज हमारे पास है, बाद में किसी और का होगा, यह चिंतन हृदय में शांति देता है। श्री राम प्रभु ने पुरुषार्थ और पुण्य के साथ वनवास खाली हाथ गए। यहां चिंतन की बात यह है कि कैकई ने राजा दशरथ से सिर्फ भरत का राज्य सिंहासन मांगा था। उन्होंने श्री राम के वनवास की बात नहीं कही थी। किंतु भाई का भाई के प्रति प्रेम था श्री राम का भरत के प्रति प्रेम था। वह जानते थे कि अगर मैं अयोध्या में रहूंगा तो भरत भी राज्य स्वीकार नहीं करेंगे और जनता भी भरत को राजा स्वीकार नहीं करेगी। इस कारण वह वन में गए। लक्ष्मण का अपने भाई के प्रति प्रेम था कि उसने भी अपने भाई को अकेले वन में नहीं जाने दिया।
पत्नी सीता का भी पति के प्रति प्रेम था कि वह भी जंगल गई। जब श्री राम ने उन्हें मना किया कि आप यहीं रहो तो सीता का कहना था कि मैं आपके आगे आगे चलकर कंकर और कांटों को दूर करूंगी ताकि आपको दुख नहीं हो। आज की सीता क्या करती आज वह तलाक ले लेती। वन में श्री राम और सीता लक्ष्मण का पुण्य था कि उन्होंने वहां पर मुनि राज को आहार भी दिया और आज के श्रावक आहार नहीं देते हैं क्योंकि उन्हें अशुद्ध खानपान का त्याग करना होता है। लक्ष्मण के चरित्र की चर्चा करते हुए मुनिराज ने बताया कि लक्ष्मण ने कभी भी सीता का चेहरा नही देखा केवल चरणों को ही देखा। यह आदर्श प्रेम अपने जीवन में परिवर्तन लेने का संदेश देते हैं तभी महापुरुषों की जयंती मनाना सार्थक होगी













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