दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य वर्धमानसागर के संघस्थ मुनि अर्पित सागर ने धर्म उपदेश देते हुए कहा कि यह शरीर क्या है, जो जीर्ण होता है और जो शरीर नाम कर्म के उदय से प्राप्त होता है। फिर हम सारा जीवन शरीर की सेवा में लगा देते हैं, इसे नहलाना व शृंगार करना आदि। हमें शरीर की सेवा मे अपना जीवन गंवाना नहीं चाहिए, बल्कि अपने अंदर विराजमान आत्मा की सेवा करना चाहिए। मुनि अपूर्व सागर ने भी प्रवचन दिए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
धरियावद। दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य वर्धमानसागर के संघस्थ मुनि अर्पित सागर ने धर्म उपदेश देते हुए कहा कि यह शरीर क्या है, जो जीर्ण होता है और जो शरीर नाम कर्म के उदय से प्राप्त होता है। फिर हम सारा जीवन शरीर की सेवा में लगा देते हैं, इसे नहलाना व शृंगार करना आदि। हमें शरीर की सेवा मे अपना जीवन गंवाना नहीं चाहिए, बल्कि अपने अंदर विराजमान आत्मा की सेवा करना चाहिए। आत्मा को पुष्ट करने के लिए देवदर्शन, गुरुसेवा, व्रत उपवास, जप तप पूजा पाठ करना चाहिए। आज मानव अपनी चिंता नहीं करता है, दूसरों की चिंता लगा रहता है और अपना समय गंवाता है। उन्होंने कहा कि शरीर के स्वरूप को देखकर ही वैराग्य प्राप्त करना चाहिए। चिंतामणि रत्न के समान हमें मनुष्य पर्या प्राप्त हुई है और रत्नत्रय प्राप्त करने का पुरुषार्थ हमें करना चाहिए। चिंतामणि रत्न के समान मानव जीवन के मूल्य को समझना चाहिए और आत्म कल्याण के मार्ग पर अपने कदम बढ़ाने चाहिए।
शक्ति से मिलती है युक्ति
धर्म सभा में मुनि अपूर्व सागर महाराज ने कहा कि मोक्ष मार्ग तीन चीजों से मिलकर बनता है। सम्यकदर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र । इन तीनों की एकता ही मोक्ष मार्ग होता है और उसी से अपना आत्म कल्याण होता है। जिस प्रकार सांसारिक जीवन में मकान को मजबूत बनाने के लिए नींव को पानी देते है। ठीक उसी प्रकार मोक्ष का महल खड़े करने के लिए कोई नींच है तो वह सम्यकदर्शन है। सम्यकदर्शन रूपी नींच को पानी देने के समान को कमा करेगी तो वह जिनेन्द्र भक्ति होगी। प्रतिदिन गुरुवचन सुनने से सम्यकदर्शन मजबूत होता है। कषाय, राग, द्वेष, मोह रूपी चोर सम्यक दर्शन को लूटते है और जिनेन्द्र भक्ति ही सम्यकदर्शन को लूटने से बचाते है। एक वितराग जिनेन्द्र भगवान की भक्ति दुर्गति में जाने से बचाती है। नरक और तिर्यच गति को दुर्गति कहा गया है। सिद्ध भक्ति के बिना तीर्थकर भी आत्म कल्याण को प्राप्त नहीं होते हैं। भक्ति से शक्ति आती है, शक्ति से युक्ति मिलती है और युक्ति से मुक्ति मिलती है। जिनेन्द्र भगवान की भक्ति इस भव और परभव में सुख देने वाली है।













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