दशलक्षण महापर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने शिविरार्थियों से कहा कि संयम का संबंध केवल प्रवृत्ति और शालीनता से नहीं, बल्कि मनोवृत्ति के परिष्कार से है। भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
भोपाल। दशलक्षण महापर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने शिविरार्थियों से कहा कि संयम का संबंध केवल प्रवृत्ति और शालीनता से नहीं, बल्कि मनोवृत्ति के परिष्कार से है। उन्होंने कहा कि यदि इन दस दिनों में प्रत्येक साधक अपने भीतर के संयम को जगा लें तो जीवन भर उसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देगा। संयम जीवन का रूपांतरण ही नहीं करता, बल्कि वह जीवन का सुरक्षा कवच और चेतना के निखार का मूल है। मुनि श्री ने भाव, विचार, वाणी और व्यवहार-इन चारों में संयम की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा-यदि भावों में शुद्धि, विचारों पर नियंत्रण, वाणी में लगाम और व्यवहार में संतुलन होगा तो हम संयम के मार्ग पर आगे बढ़ सकेंगे।
भावनायोग मन तथा विचारों की शुद्धि का प्रमुख साधन
मुनिश्री प्रमाणसागर जी ने बताया कि सामान्य व्यक्ति के मन में प्रतिदिन लगभग साठ हजार विचार आते हैं, जिनमें से उपयोगी विचार बहुत कम होते हैं। विचार मन से उत्पन्न होते हैं और भावनायोग मन तथा विचारों की शुद्धि का प्रमुख साधन है। मुनि श्री ने श्रोताओं को प्रेरित किया कि वे अपने विचारों के प्रहरी बनें और उन पर नियंत्रण रखें, क्योंकि भावों का अनुशासन ही भावों का संयम है।
संयमी व्यक्ति इच्छाओं का गुलाम नहीं होता
मुनि श्री ने कहा कि संयम से आत्मबल का निर्माण होता है। संयमी व्यक्ति इच्छाओं का गुलाम नहीं होता, बल्कि उनका स्वामी बन जाता है। आज जब पूरी दुनिया भोगवाद की अंधी दौड़ में लगी हुई है, तब जैन धर्म का ष्उत्तम संयमष् जीवन को दिशा देने वाला प्रकाश स्तंभ है। इच्छाओं पर नियंत्रण ही सच्चे आत्मबल, शांति और आनंद की प्राप्ति का मार्ग है।
सभी संयमियों का सम्मान किया
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि उत्तम संयम दिवस पर उन सभी संयमियों का सम्मान किया गया। जिन्होंने पांच उपवास पूर्ण किए हैं। वहीं, सात और दस उपवास का संकल्प लेने वाले श्रद्धालुओं ने गुरुचरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
दशलक्षण विधान भक्ति भाव से हुआ
प्रातः 5.30 बजे भावनायोग के पश्चात श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। इसके उपरांत नित्य नियम पूजन एवं पर्व पूजन के साथ दशलक्षण विधान भक्ति भाव से हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर जी महाराज सहित समस्त क्षुल्लक मंचासीन रहे। संचालन बाल ब्र. अशोक भैया लिधौरा ने किया।













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