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शास्त्र ही हमारा आगम ज्ञान रूपी धन है: टोंक में मनाया वीर शासन जयंती दिवस 


जैन धर्म के 24वें अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी को केवल ज्ञान होने के बाद योग्य शिष्य गणधर के अभाव में 66 दिनों तक दिव्य धर्म उपदेश नहीं हुआ। आज के दिन महावीर स्वामी की धर्म देशना को गौतम गणधर स्वामी ने श्रवण कर शास्त्रों की रचना की। इसी कारण आज का दिन वीर शासन जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह उद्गार आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने व्यक्त किए। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


टोंक। जैन धर्म के 24वें अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी को केवल ज्ञान होने के बाद योग्य शिष्य गणधर के अभाव में 66 दिनों तक दिव्य धर्म उपदेश नहीं हुआ। आज के दिन महावीर स्वामी की धर्म देशना को गौतम गणधर स्वामी ने श्रवण कर शास्त्रों की रचना की। इसी कारण आज का दिन वीर शासन जयंती के रूप में मनाया जाता है। प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ से लेकर अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी तक सभी ने धर्म का प्रवर्तन किया। तीर्थ प्रवर्तन से जीवन का निर्माण होता है। मंदिर नए बनाए जा सकते हैं किंतु प्राचीन शास्त्र दोबारा नहीं लिखे जा सकते हैं। इसलिए प्राचीन मूल ताड़ पत्रों पर अंकित शास्त्रों ग्रंथों का संरक्षण बहुत जरूरी है क्योंकि, शास्त्र ही हमारा आगम ज्ञान रूपी धन है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने वीर शासन जयंती पर आयोजित धर्म सभा में प्रगट की। आचार्य श्री ने आगे बताया कि आचार्य श्री शांतिसागर फाउंडेशन के अनिल सेठी और उनकी टीम ने अनेक नगरों में ताड़पत्रों तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों का संरक्षण का सराहनीय प्रशंसनीय कार्य किया है।

आगे भी उनका कार्य जारी है। इसके लिए सभी को तन-मन धन से जिनवाणी संरक्षण हेतु दान देना चाहिए। प्रवचन शास्त्रों के अनुसार देश-विदेश में वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। जैन शास्त्रों में विज्ञान निहित हैं सभी को तन-मन-धन से जिनवाणी के संरक्षण में योगदान देना चाहिए। जप शब्द में ज शब्द धर्म में जाग्रत और प शब्द परमात्मा का सूचक है। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी मुनि दीक्षा शताब्दी वर्ष 2020 तथा आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव वर्ष 2024 में उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की प्रेरणा से गठित आचार्य श्री शांतिसागर फाउंडेशन सक्रिय कार्य कर रहा हैं। मुनि श्री के पूर्व कलकत्ता के श्री चिरंजीलाल बगड़ा ने आचार्य श्री शांति सागर जी द्वारा किए गए 9938 उपवास की साधना का प्रतीक 9938 की राशि श्रुत जिनवाणी संरक्षण हेतु दान का अनुरोध किया।

आचार्य श्री की प्रेरणा उपदेश से प्रभावित होकर स्थानीय श्रेष्ठी ने एक लाख प्रतिवर्ष अनुसार 10 वर्षों में 10 लाख दान की तथा उपस्थित सैकड़ों भक्तों ने रुपए 9938 अनुसार दान देने की स्वीकृति दी। इसके पूर्व आचार्य संघ सानिध्य में अनेक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। धर्मसभा में दीप प्रवज्जलन के बाद विगत 18 वर्षों से संघ में आहार चौका लगाने में अग्रणी तारा सेठी ने मंगलाचरण किया। उसके बाद श्री महावीर स्वामी की संगीत के साथ पूजन की गई।

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