उत्तम त्याग धर्म का अभ्यास व्यक्ति की आंतरिक शांति और संतुलन को बढ़ावा देने के साथ-साथ उसके समाज और दुनिया में भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यह त्याग के साथ-साथ सेवा और करुणा का भी एक महत्वपूर्ण भाग है। पढ़िए मुनि श्री पूज्य सागर महाराज का विशेष आलेख…
दसलक्षण धर्म का आठवां कदम ‘उत्तम त्याग धर्म’। यह कदम व्यक्ति पूर्ण त्याग या मर्यादित रहने का उपदेश देता है। सही मायने में त्याग के बिना कोई भी धर्म जीवित नहीं रह सकता। धर्म तथा आत्मा को जीवित रखने के लिए त्याग नितांत जरूरी है। समस्त जड़ वस्तु का त्याग करने वाला ही मुक्ति को प्राप्त कर पाता है। धर्म के साथ त्याग ही ‘उत्तम त्याग’ है और पुण्य का कारण भी। जर-जोरू-जमीन कोमन, वचन और काय के साथ त्याग करना ही धर्म है नहीं तो मात्र त्याग है। इन तीनों का उपयोग धर्म कार्य में किया जाए तो संसार में सुख, शांति और समृद्धि के साथ मोक्ष मिलती है।
जर (संपत्ति) का उपयोग अध्यात्म की उन्नति के मन्दिर बनवाएं और व्यक्तियों के अन्दर वात्सल्य और उपकार की भावना और राष्ट्र विकास के लिए अस्पताल, स्कूल और व्यक्ति में मानवता जाग्रत करने के लिए करें। जोरु (स्त्री) को भोग का नहीं, धर्म का साधन मानें। भोग का साधन मानने वालों के लिए वह काली दुर्गा है और धर्म का साधन मानने वालों के लिए सरस्वती, लक्ष्मी है। जमीन का उपयोग मन्दिर, साधना केंद्र अनाथों के लिए घर और जीवनयापन के लिए खेती के उपयोग में करें, तभी भगवान आदिनाथ का कृषि कर्म पूरा होगा।













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