जैन धर्म में राजस्थान में संतों और साधुओं ने जहां अपनी तप और साधना के बल पर जन जागृति का अलख जगाया तो कुछ संत ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल अपने साहित्य साधना से ही धर्म, संयम और उपासना के साथ आराधना के महत्व को प्रतिपादित किया। ऐसे संतों में एक नाम संत श्री सुमति कीर्ति का नाम आता है। इन्होंने कई रचनाओं के माध्यम से जन जागरण किया। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 10वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संतश्री सुमतिकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
एक ही काल में दो संत एक ही नाम के
सुमति कीर्ति नाम वाले अब तक विभिन्न संतों का नामों का उल्लेख मिलता है। इनमें दो सुमति कीर्ति एक ही समय हुए और दोनों ही अपने समय के अच्छे विद्वान माने जाते रहे। इन दोनों में एक का भट्टारक ज्ञानभूषण के शिष्य के रूप में और दूसरे का भट्टारक श्री शुभचंद जी के शिष्य के रूप में उल्लेख मिलता है। आचार्य श्री सकल भूषण ने श्री सुमति कीर्ति का भट्टारक श्री शुभचंदजी के शिष्य के रूप में अपनी उपदेश रत्न माला में उल्लेख किया है। दूसरे सुमति कीर्ति का उल्लेख भट्टारक श्री ज्ञानभूषण के शिष्य के रूप में जानकारी मिलती है।
धर्म परीक्षा रास सबसे बड़ी कृति
सुमतिकीर्ति 16-17 शताब्दी के विद्वान थे। गुजरात और राजस्थान दोनों ही प्रदेश इनके पद चिन्हों से पावन हुए थे। साहित्य सृजन और आत्म साधना ही इनके जीवन का मुख्य लक्ष्य था, लेकिन इससे बढ़कर था, इनका गांव-गांव जाकर जन-जाग्रति फैलाना। लोग अशिक्षित थे और मूढ़ताओं के चक्कर में फंसे हुए थे। वास्तविक धर्म की ओर इनका ध्यान कम हो गया था और मिथ्या आडंबरों की ओर प्रवृति होने लगी थी। यही कारण है कि इन्होंने ‘धर्म परीक्षा रास’ की सबसे पहले रचना की। यह इनकी सबसे बड़ी कृति भी है। जिससे ‘अमितिगति आचार्य’ द्वारा निबद्ध ‘धर्म परीक्षा’ का सार रूप में वर्णन है। कवि की अन्य रचनाएं लघु होते हुए भी काव्यत्व शक्ति से परिपूर्ण हैं। गीत, पद और संवाद के रूप में इन्होंने जो रचनाएं प्रस्तुत की हैं, वे पाठक की रुचि को जाग्रत करने वाली हैं।
भट्टारक श्रीवीरचंद के शिष्य थे श्री सुमति
श्री सुमति कीर्ति मूलसंध में स्थित नंदी संघ बलात्कारगण एवं सरस्वती गच्छ के भट्टारक श्रीवीरचंद के शिष्य थे। इनके पूर्व भट्टारक श्री लक्ष्मीभूषण, श्री मल्लिभूषण और श्री विद्यानंदी हो चुके थे। संतश्री सुमतिकीर्ति जी ने ‘प्राकृत पंच संग्रह टीका’ को संवत 1620 में भाद्रपद शुक्ल दशमी के दिन ईडर के ऋषभदेव मंदिर में पूर्ण की थी। इस टीका का संशोधन भी भट्टारक श्री ज्ञानभूषण ने किया था।
साहित्य साधना को दी प्रमुखता
सुमतिकीर्ति संत थे और भट्टारक पद की उपेक्षा करके साहित्य साधना में अपनी विषेष रुचि रखते थे। एक भट्टारक विरदावली में ज्ञानभूषण की प्रशंसा करते समय उनके शिष्यों के नाम गिनाए तो संत श्री सुमतिकीर्ति को सिद्धांतवेदी एवं र्निग्रंथाचार्य दो विशेषण से अलंकृत किया गया। वे संस्कृत, प्राकृत हिन्दी और राजस्थानी के अच्छे विद्वान थे। साधु बनने के बाद इन्होंने अपना अधिकांश जीवन साहित्य साधना में लगाया और साहित्य जगत को कितनी ही रचनाएं भेंट की।
सुमतिकीर्ति जी की प्रमुख और प्रेरणादायी रचनाएं
इनकी प्रसिद्ध रचनाओं में कर्मकांड टीका, पंचसंग्रह टीका, धर्म परीक्षा रास, जिनवर स्वामी विनती, जिह्वा दंत विवाद, वसंत विद्या विलास, पद (काल अने तो जीव बहुं परिभ्रमतां) और शांतिनाथ गीत आदि ने खूब ख्याति अर्जित की है। ‘धर्म परीक्षा रास’ का रचना काल 1625 का बताया गया है।













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