
सम्मेद शिखर, जैन धर्म का सबसे प्राचीन, पुराना एवं स्वतंत्र धर्म है । इस धर्म के पूरे देश में सिद्धक्षेत्र, अतिशय क्षेत्र हैं । सम्मेद शिखर पर हमारे 20 तीर्थंकरों को मोक्ष को सिद्ध किया है , इसीलिए सम्मेद शिखर हम जैनियों के लिए प्राणिक स्थल है । पूरी दुनिया इस बात को जानने लगी है लेकिन केन्द्र और झारखंड़ सरकार ने अधिसूचनाओं और अध्यादेशों के जरिए इस पावन तीर्थ स्थल को पर्यटक स्थल बनाने की कोशिश की है । अब वो इसमें कामयाब नहीं होंगे । पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में फैले जैन समाज के लोग सम्मेद शिखर पर मंडराते संकट पर बात कर रहे हैं ।
सरकार इतनी सी बात नहीं समझती कि ये केन्द्र हमारे श्रद्धालूओं की शांति और साधना के लिए अनुकुल वातावरण देता है । यहां आस्था तो ही है मगर वो प्राकृतिक माहौल भी हैं जहां साधना से मनुष्य जीवन में आकर हमारे तीर्थंकरों ने ईश्वरत्व को पाया है । पर्यटन से हमारे क्षेत्र में शांति, साधना में बाधा उत्पन्न होती है । अल्पसंख्यक होने के नाते, इस देश के नागरिक होने के नाते ये हमारा अधिकार है कि हम अपनी संस्कृति,अपने पवित्र स्थल, अपनी भाषा, अपने साहित्य, अपनी पूजा पद्दति को अपना सकते हैं । अगर इसी पर चोट करेंगे तो यह देश के संविधान में दी गए अधिकारों पर चोट हैं ।
ये सम्मेद शिखर पर ही नहीं, देश के संविधान पर चोट का मामला है । देश के संविधान में आर्टिकल 29 और 30, बहुसंख्यकों के साथ ही अल्पसंख्यकों को अपने धर्म,संस्कृति,भाषा,साधना, स्थान, वेशभूषा संरक्षित करने का अधिकार देता है । हम सभी को अधिकार है कि हम अपने-अपने धर्मानुसार साधना करें , अगर आप हमारा साधना स्थान ही छीन लेंगे तो फिर जैन अनुयायी कहां जाएंगे ? हमें इस देश में अपनी विविधता के साथ जीने का अधिकार है या नहीं ? कल गिरिनार जी, फिर पालीताना अब सम्मेद शिखर, मुद्दा हमारे तीर्थ स्थानों का तो अब पीछे हैं, बात यह है कि हमें संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की साजिश कौन रच रहा है ? ये सरकार की भी जिम्मेदारी है कि हमारे धर्म स्थानों की पवित्रता भंग न हो । सिर्फ जैन ही नहीं, बल्कि सारे अल्पसंख्यकों के हित और उनके आस्था स्थानों को लेकर सरकार एक ही रुख रख रही है और उनको एक ही दिशा में ले जाना चाहती है, जो कि संविधान के विरुद्ध है ।
जैन समाज के आंदोलन पर मुझे सभी से यही कहना है कि मेरी राय में ये जैनियों पर ही नहीं बल्कि सभी अल्पसंख्यकों पर आक्रमण है । जैन समाज के लोगों ने कोल्हापुर में दिखाया है कि वो इस तरह आक्रोशित हैं । लाखों की संख्या में वहां जैन समाज के लोगों का प्रदर्शन हुआ है । सरकारों को चाहिए कि छोटे-छोटे धर्मों की विविधता खत्म न करे । हम हिन्दू नहीं बल्कि हम जैन है । देश के संविधान ने हमें अपने मत को मानने का अधिकार दिया है । हमारी राय में हिन्दू तो कोई धर्म नहीं बल्कि धर्म तो वैदिक धर्म है । हर धर्म की तरह जैन धर्म की कुछ विशेषताएं, विशिष्टताएं हैं ।
मैं यहां पार्टीबाजी की बात नहीं कर रहा लेकिन सारे देश को एक हिन्दुत्व को आगे लाने के लिए बाकी धर्मों को अलग नहीं किया जा सकता , ये सभी को समझना होगा । हमें 1993 में, हिन्दू मानकर अल्पसंख्यकों की श्रेणी से निकाल दिया था । उस वक्त भी हमारे अस्तित्व पर संकट आया । मगर तत्कालीन सरकार ने हमारी भावनाओं को समझा और अल्पसंख्यक दर्जा दिलवाया ।
सरकार को यह समझना चाहिए कि हमें हिन्दू धर्म में शामिल नहीं किया जा सकता । ऐसा करने से जैन धर्म की विशेषता में बाधा आ सकती है । हमारे उसके अस्तित्व पर संकट आ सकता है । जैन इस देश का प्राचीन धर्म है । हमारे धर्म,भाषा,संस्कृति सुरक्षित रहना चाहिए ।
मुझे ऐसा लगता है कि जनआंदोलन, वोट बैंक से कुछ नहीं होगा । इसके लिए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट में दायर करना चाहिए। ये हमारे फंडामेंटल राइट्स पर हमला कर रहे हैं । जब कोई हमारी नहीं सुनता है तो न्याय संस्था अंतिम संस्था है । जन आंदोलन में कोई किसी की नहीं सुनता है । आंदोलन के बाद सिर्फ आश्वासन मिलते हैं, लेकिन आश्वासन के बाद भी कुछ नहीं हुआ तो क्या करोगे ?
सम्मेद शिखर, हमारे साधु-संतों की तपश्चर्या स्थली है। इसकी सुरक्षा के लिए अदालत में रीट लगानी ही होगी । सरकार को हमारी बात सुननी ही पड़ेगी । जैन समाज देश का मूल निवासी है। जैन समाज की संस्कृति ही देश की विशेषता के रूप में दुनिया भर में बताई जाती है । सत्य,अहिंसा,परोपकार,लोकशाही सब कुछ तो जैन समाज की देन है । मुझे लगता है कि जैन समाज ही नहीं, व्यापक रूप में जैन, मुस्लिम, बौद्ध, क्रिश्चियन, सिखों सभी को साथ लेकर सरकार से अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर सीधी बात करनी चाहिए ।













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