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जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी का समाधिमरण : बहुआयामी कार्यों में निखरा हुआ था कौशल 


कर्नाटक राज्य के श्री क्षेत्र श्रवणबेलगोला मठ के भट्टारक जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी का 23 मार्च 2023 गुरुवार सुबह सम्यक समाधिमरण हो गया। भट्टारक चारुकीर्ति स्वामी जी अपने नित्य नियमानुसार प्रातः घूमने निकले थे। इसी दौरान वे अचानक गिर गए और उनका सम्यक समाधिमरण हो गया। पढ़िए धरियावद के दिगंबर जैन समाज के अशोक कुमार जेतावत की रिपोर्ट…


धरियावद-श्रवणबेलगोला। परमपूज्य जगद्गुरु कर्मयोगि स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टरक महास्वामीजी की पार्थिव देह अंतिम दर्शन के लिए श्रवणबेलगोला स्थित चामुंडराय मंडप में रखी गई। इसके बाद सांयकाल में अंतिम यात्रा निकाली गई। सूर्यास्त से पूर्व संपूर्ण धार्मिक विधि- विधानों के साथ एवं संपूर्ण सरकारी गौरव के साथ छोटे पहाड़ के तलहटी के निषिधिका परिसर में अंतिम संस्कार किया गया।

श्रीस्वामी जी का जीवन परिचय

जन्म- सिद्धक्षेत्र वारंगा,

पिता- चंद्रराज जी इंद्र,

माता- श्रीमती कान्तेजी

जन्म तारीख- 3 मई सन् 1949,

जन्म नाम- रत्न वर्मा जी

संन्यास दीक्षा:- 12 दिसंबर 1969

19 अप्रैल महावीर जयंती पर 1970 में श्रवणबेलगोला मठ में पट्टाभिषेक कर इनका पीठाधिकारी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी नाम पड़ा। तब से वे श्री क्षेत्र की अभिवृद्धि, श्रुत संवर्धन, समाज कल्याण और बच्चों के लिए शिक्षा सुविधा के कार्यों में जुटे रहे। श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला का नवतर रूप, 40 से अधिक मंदिरों का जीर्णोद्धार, साफ-सुथरे विंध्यगिरि, चंद्रगिरि एवं गांव के सभी मंदिर, जिनमें एक ही साथ होती अभिषेक-पूजन को अनमोल मार्गदर्शन एवं व्यवस्था शक्ति का द्योतक थे। उन्होंने मैसूर से इतिहास में एमए बैंगलोर विद्यापीठ के तत्वाधान में एमए जैनागम में विशेष अध्यापन किया। हिंदी और संस्कृत साहित्य में विशारद किया। कन्नड़, अंग्रेजी, संस्कृत तथा हिंदी भाषा पर असाधारण प्रभुत्व सरल आकर्षक व्यक्तित्व पाश्चात्य दर्शनों के अध्ययन से अमेरिका, अफ्रीका, इंग्लैंड, बर्मा, थाईलैंड आदि अनेक देशों में अतिथि वक्ता के रूप में आमंत्रित किए गए। सन् 1988 में इंग्लैंड के लेस्टर शहर में भगवान श्री बाहुबली स्वामी जी की 7 फीट ऊंची प्रतिमा का प्रतिष्ठापन उनके मार्गदर्शन में संपन्न हुआ था। कारकल, कनकगिरि, कम्मदहल्ली अर्हत्सुगिरि मठ, मूडबिद्री मठ आदि के धर्म प्रभावी कार्यों में तथा बहुआयामी कार्यों में उनका कौशल निखरा हुआ था। भट्टारक चारुकीर्ति महास्वामी भगवान महावीर स्वामी के 2500वें निर्वाण महोत्सव के शुभ प्रसंग पर, भगवान गोम्मटेश्वर सहस्राब्दी महोत्सव के मुख्य प्रेरणा स्रोत रहे।

विराट महोत्सवों का सहज आयोजन

विश्व के सात आश्चर्यों में शामिल 57 फीट ऊंची विशालकाय श्रीगोम्मटेश बाहुबली स्वामी प्रतिमा का बारह वर्षों पश्चात् होने वाले महामस्तकाभिषेक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने श्रीस्वामी जी को ‘कर्मयोगी’ की उपाधि से अलंकृत किया था। 2017 में कर्नाटक सरकार ने महावीर शान्ति पुरस्कार प्रदान किया, जिसमें 10 लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र, शॉल, श्रीफल, माला पहनकर सम्मानित किया था।

धरियावद को मिला सानिध्य

12 वर्षों के अंतराल पर नियमित होने वाले गोम्मटेश भगवान बाहुबली स्वामी के विश्वस्तरीय महामस्तकाभिषेक वर्ष 1981, 1993, 2006 और 2018 के वर्षों में वात्सल्य वारिधि दिगंबर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जैन (धरियावद) के कुशल निर्देशन में आपने चारों विराट आयोजन धर्म प्रभावनापूर्वक सफलतापूर्वक संपन्न किए। अप्रैल 2001 में विश्व के सबसे छोटे सर्वांग हेमवंत श्री चंद्रप्रभु जिनालय नंदनवन के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव में आपका प्रवास धरियावद नगर को प्राप्त हुआ और पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सानिध्य और मार्गदर्शन प्रदान हुआ था। आप अप्रैल 1970 से मार्च 2023 तक लगातार आजीवन श्रवणबेलगोला मठ के पीठाधीश स्वामी रहकर जैन धर्म को विश्वस्तर पर नित नई पहचान और ऊंचाइयां दिलाईं।

समाज सेवा में सतत् अग्रणी रहे

– 2006 के महामस्तकाभिषेक के समय स्वामीजी ने पूरे गांव में सरकार व प्रशासन के सहयोग से शौचालय निर्माण का कार्य पूरा कराया

– आसपास के सभी गांवों के बीमार व्यक्तियों के स्वास्थ्य लाभ हेतु मोबाइल चिकित्सालय का संचालन किया

– जैन मठ से जैन-जैनेतर लोगों को हर माह नकद राशि का सहयोग किया

– बाहुबली बाल चिकित्सालय में 100 बेड और 100 बेड के जनरल अस्पताल का संचालन किया जा रहा है

– कर्नाटक में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राशन, कपड़े, चिकित्सा आदि की व्यवस्था की गई

– बच्चों को संस्कारित करने के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम का संचालन, जिसमें धार्मिक और लौकिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान की जाती है

– नर्सरी से लेकर इंजीनियरिंग कॉलेज का संचालन किया जा रहा है

– जैन साहित्य और अन्य साहित्यों के प्रचार-प्रसार हेतु अनेक साहित्यकारों, विद्वानों और पत्रकारों को प्रतिवर्ष पुरस्कार प्रदान किया जाता है और सम्मेलनों का आयोजन होता है

– आर्थिक दृष्टि से पिछड़े समुदाय के व्यक्तियों को चिकित्सा सुविधा के साथ असहाय, मंदबुद्धि को 1100 रुपये प्रतिमाह सदस्यता राशि प्रदान की जाती है

– 1981 में पूरे देश में जनमंगल कलश का भ्रमण करवाया

– प्राचीन साहित्य के प्रकाशन के लिए अक्षर कलश योजना प्रारंभ की गई

– 6000 से अधिक पांडुलिपियां सुरक्षित की गईं

– साधुओं की सेवा के लिए त्यागी सेवा समिति अलग से बनाई गई

स्वामीजी ने 53 वर्षों में जो कुछ किया है, वह समाज के लिए प्रेरणास्पद है। सभी तरह के मठों, संस्थाओं और मंदिरों का संचालन धार्मिक क्रियाकलापों के साथ सामाजिक कार्यों के संचालन किया जा सका है।

परमपूज्य चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी ने अपने सिद्धहस्त करकमलों से 9 भट्टारक स्वामीजी को दीक्षा प्रदान कर अपना शिष्यत्व प्रदान किया है, जो अलग-अलग मठों की बागडोर संभाते हुए उन क्षेत्रों के विकास हेतु प्रतिबद्ध हैं-

1. स्वस्ति श्री ललित कीर्ति भट्टारक स्वामी- कारकल मठ

2. स्वस्ति श्री भुवनकीर्ति स्वामी – कनकगिरि मठ

3. स्वस्ति श्री भानुकीर्ति भट्टारक स्वामी- कम्ब्दहली मठ

4. स्वस्ति श्री धवलकीर्ति स्वामी जी – अर्हंतगिरि मठ

5. स्वस्ति श्री चारुकीर्ति स्वामी- मूडबिद्री जैन मठ

6. स्वस्ति श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी (धर्मकीर्ति स्वामि) – हुमचा पद्मावती मठ

7. स्वस्ति श्री लक्ष्मीसेन स्वामी जी – नरसिंहराजपुर मठ (ज्वालामालिनी) मठ

8. स्वस्ति श्री भट्टाकलंक भट्टारक स्वामी जी – सौन्दा मठ

9. अरतिपुर के पट्ट विचारक क्षुल्लक सिद्धांतकीर्ति स्वामी जी

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