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आहार दान के पुण्य से मोक्ष की प्राप्ति होती हैं: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में दी मंगलदेशना 


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने नीमच की धर्मसभा में आहारदान का महत्व बताया। आचार्यश्री ने भगवान आदिनाथ जी के आहारचर्या के बारे में विस्तार से श्रावकों को समझाया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। नीमच से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


नीमच। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधुओं सहित नीमच विराजित हैं। अक्षय तृतीया जैन धर्म के दृष्टिकोण से पावन दिवस है, क्योंकि प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान का अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ला तीज को एक वर्ष के बाद उपवास के बाद पारणा होकर प्रथम आहार हुआ था। श्री आदिनाथ भगवान ने श्रमण साधुओं के लिए आहार चर्या का मार्गदर्शन किया। श्री ऋषभदेव भगवान ने गृहस्थों को असि, मसी, कृषि, शिल्प, कला और वाणिज्य आवश्यक कार्यों का ज्ञान कराया। अपनी पुत्रियों ब्रह्मी और सुंदरी के माध्यम से अंक और लिपि का ज्ञान कराया। वह जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, उनके पुत्र भरत प्रथम चक्रवती अन्य पुत्र अनंत वीर्य प्रथम गणधर तथा बाहुबली प्रथम कामदेव हुए। उन्होंने सभी 100 पुत्रों को विभिन्न कलाआंे का ज्ञान कराया। यह मंगलदेशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने नीमच की धर्मसभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने कहा कि श्री ऋषभदेव ने 84 लाख वर्ष पूर्व की आयु में जब एक लाख वर्ष पूर्व की आयु शेष थी तब दीक्षा धारण की। आचार्य श्री ने बताया कि 83 लाख वर्ष होने के बावजूद तीर्थंकर वृद्ध नहीं बुढ़ापा नहीं आता है, सदा वह जवान रहते हैं। आचार्य श्री ने बताया कि श्री आदिनाथ महा मुनिराज ने छह माह का योग धारण कर उपवास किया था। आगामी 6 माह में उपवास के बाद जब आहार के लिए निकले तो 6 माह तक उन्हें आहार की विधि नहीं मिली, आहार नहीं हुआ क्योंकि, किसी को भी साधुओं को आहार देने का ज्ञान नहीं था। अनेक श्रावक कोई हीरे रत्न लाता था, कोई राज्य सौंपता था, कोई कन्याएं देता था किंतु आगम की विधि अनुसार उन्हें आहार के लिए नवधाभक्ति से पड़गाहन नहीं करते थे। तब आहार के लिए एक नगर से दूसरे नगर भ्रमण विहार करते हुए हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस को महा मुनिराज आदिनाथ की मुद्रा देखकर पूर्व भव का जाति स्मरण हुआ और उन्होंने श्री आदिनाथ महामुनिराज का पड़गाहन किया और गन्ने के रस से आहार कराया।

साधु के पड़गाहन की सही विधि बताई

आचार्य श्री ने इस अवसर पर बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने वर्ष 1915 में क्षुल्लक दीक्षा ली थी। उस समय श्रावकों को नवधा भक्ति से आहार चर्या का ज्ञान नहीं था। 3 दिन से ज्यादा उपवास हो गए। तब मंदिर के उपाध्याय ने साधु के पड़गाहन की सही विधि बताई, तब आहार हुआ। आचार्य श्री ने बताया कि दान की दृष्टि से तीर्थंकर उत्तम, मुनि और आर्यिका मध्यम तथा क्षुल्लक और क्षुल्लिका जघन्य पात्र होते हैं। पात्रों को आहारदान से वैसा फल प्राप्त होता हैं। आहारदान देने से राजा श्रेयांश मोक्ष गए। मानव जीवन की सार्थकता आहार दान, अभय दान, औषधी दान और शास्त्र दान देने से होती है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

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