आचार्य शांति सागर क्षाणी परंपरा के चतुर्थ पट्टाचार्य, 20वीं सदी के परम तपस्वी, प्रातः स्मरणीय माषोपवासी चारित्र चक्रवर्ती समाधि सम्राट आचार्य श्री 108 सुमति सागर जी महाराज का जन्म असोज शुक्ल चौथ विक्रम संवत 1974 को अम्बाह के श्यामपुर गांव में हुआ। वे उपरोचिया दिगंबर जैसवाल जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठी श्री छिददूलाल जी भंडारी के घर में माताजी श्रीमती चिरोंजादेवी की कोख से जन्मे थे। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…
मुरैना। आचार्य शांति सागर क्षाणी परंपरा के चतुर्थ पट्टाचार्य, 20वीं सदी के परम तपस्वी, प्रातः स्मरणीय माषोपवासी चारित्र चक्रवर्ती समाधि सम्राट आचार्य श्री सुमति सागर जी महाराज का जन्म असोज शुक्ल चौथ विक्रम संवत 1974 को अम्बाह के श्यामपुर गांव में हुआ। वे उपरोचिया दिगंबर जैसवाल जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठी श्री छिददूलाल जी भंडारी के घर में माताजी श्रीमती चिरोंजादेवी की कोख से जन्मे थे।
आप चार भाई और एक बहन में सबसे बड़े थे, और आपका विवाह श्रीमती राम श्री देवी के साथ हुआ, जिनसे आपके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। आचार्य श्री सुमति सागर जी महाराज के परम भक्त अनूप जैन भंडारी के अनुसार, आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज की प्रेरणा से आपके मन में वैराग्य के भाव जागृत हुए। आपने चैत्र शुक्ल तेरस विक्रम संवत 2025 को रेवाड़ी, हरियाणा में गुरुदेव आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज से एलक दीक्षा ग्रहण की और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हुए। अगहन वदी बारस विक्रम संवत 2025 को आपने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में मुनि दीक्षा ग्रहण कर निर्ग्रन्थ दिगंबरत्व को धारण किया।
गुरुदेव ने आपको “सुमति सागर” नाम प्रदान किया और आपको भिण्ड, मध्य प्रदेश में समाधि के पश्चात जेष्ठ सुदी पंचमी विक्रम संवत 2030 को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। आपने निर्दोष चर्या का पालन करते हुए कठोर साधना की और एक माह का उपवास किया, जिसके कारण आप “माषोपवासी” कहलाए। आपकी प्रेरणा से देशभर में अभूतपूर्व धर्म प्रभावना हुई। आपने अनेक स्थानों पर मानस्तम्भ, जैन मंदिर, त्यागी व्रती आश्रम, औषधालय, पुस्तकालय आदि का निर्माण कराया और प्राचीन साहित्य का प्रकाशन करवाया।
आपके प्रमुख शिष्यों में आचार्य श्री 108 भरत सागर जी महाराज, आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज, आचार्य श्री विद्या भूषण सन्मति सागर जी महाराज, आचार्य श्री 108 ज्ञान सागर जी महाराज, आचार्य श्री विवेक सागर जी महाराज और गणीनी आर्यिका श्री राजमती माताजी प्रमुख हैं। आपकी प्रेरणा से अजमेर में औषधालय, मुरैना में मानस्तम्भ, श्री 1008 सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी एवं शाश्वत तीर्थ श्री सम्मेद शिखर जी पर त्यागी व्रती आश्रम स्थापित किए गए।
3 अक्टूबर 1994 को श्री 1008 सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी के त्यागी व्रती आश्रम में आपने पूर्ण चैतन्य अवस्था में अपने इस नश्वर शरीर को छोड़कर देव लोक गमन किया। ऐसे परम उपकारी उत्कृष्ट साधक की प्रेरणा हम सभी भव्य जीवों के लिए मंगलमय व कल्याणकारी बने, इसी भावना के साथ गुरुदेव के चरणों में कोटि-कोटि नमन।
चरण सेवक
अनूप भंडारी, मुरैना













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