मुरैना के बड़े जैन मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि साधक की साधना में सहयोग करना प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है। उन्होंने संयम साधना, नियम पालन और अपने इष्ट पर अटूट श्रद्धा रखने का महत्व समझाया। पढ़िए मनोज जैन की ख़ास रिपोर्ट….
मुरैना। बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा के दौरान चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि प्रत्येक श्रावक का यह कर्तव्य है कि वह साधु-संतों की चर्या में सहयोग प्रदान करे। साधक की साधना में सहयोगी बनना श्रावकों के लिए पुण्य का कार्य है।
उन्होंने कहा कि आज साधु-संतों का सान्निध्य सहजता से मिल रहा है, जबकि बीते समय में यह दुर्लभ था। जब भी साधु-संतों का सान्निध्य मिले, उस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए और उनके प्रवचनों से जीवन को साधना मार्ग पर ले जाना चाहिए।
मुनिश्री ने समझाया कि संयम की साधना में सहयोगी बनने के लिए श्रावकों को साधु-संतों के लिए शांत और स्वच्छ स्थान, शुद्ध आहार, स्वाध्याय के लिए शास्त्र और प्रवचनों हेतु उचित व्यवस्था करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि साधु आहारचर्या पर निकलें तो मार्ग के अवरोध दूर करके भी श्रावक साधना में सहभागी बन सकते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि साधक का लक्ष्य केवल स्वकल्याण ही नहीं होता बल्कि परकल्याण भी उसमें निहित होता है। जैन साधु मोह, राग-द्वेष का त्याग कर मोक्ष की साधना करते हैं और उनका आशीर्वाद श्रावकों को भी कल्याण के मार्ग पर ले जाता है।
जिनेंद्र प्रभु और गुरुओं में पूर्ण आस्था रखनी चाहिए
नियम पालन के महत्व को बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि नियम लेने पर मित्र या समाज के लोग उसे तोड़ने के लिए उकसाते हैं, लेकिन ऐसे समय में अपने इष्ट और धर्म के सिद्धांतों पर अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए। यही श्रद्धा साधना की ओर आगे बढ़ाती है। अंत में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि संकट और विपत्ति के समय श्रावक को अपने इष्ट जिनेंद्र प्रभु और गुरुओं में पूर्ण आस्था रखनी चाहिए। प्रभु की भक्ति से प्रतिकूलताएँ अनुकूलताओं में बदल जाती हैं, जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है।













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