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साधन चर्या में विश्व में दिगम्बर साधु ही श्रेष्ठ साधकः आचार्य श्री सुन्दर सागर जी महाराज

  • मजबूरी में किए गए कार्य का फल भी मजबूरी जैसा ही

न्यूज़ सौजन्य- कुणाल जैन

प्रतापगढ़। आचार्य श्री सुन्दर सागर जी महाराज ने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए कहा है कि आपके इस राग-द्वेष के परिसर में भी हमें भगवान वीतराग की वाणी सुनने को मिल रही है, सौभाग्यशाली हैं आप। सभी सम्प्रदाय में साधु हैं, पर साधन चर्या में विश्व में दिगम्बर साधु ही श्रेष्ठ साधक हैं, निःस्पृहीग्रही हैं, राग-द्वेष से रहित हैं। यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं, निरोगी रहना चाहते हैं तो जिन शासन चाहिए। विज्ञान आज इन कुछ वर्षों में इन बातों को बता रहा है, पर जिन वाणी, जैन साधु, जैन धर्म काफी पहले यह लिख चुके हैं। डॉक्टर कहता हं कि घास पर नंग पैर चलो, पर घास पर जीव का ह्वास किया, पाप कमाया, जीव की तरफ बिना देखे दौड़े। डॉक्टर कहता है कि रात्रि को भोजन नहीं करना है, तो नहीं करोगे, पर जिन वाणी में दिगम्बार जैन गुरु यही बात कब से कह रहे हैं। डॉक्टर कहता है कि गर्म पानी पानी है, तभी पियोगे। धार्मिक कार्य में ऐसा नहीं चलता।

जैन धर्म मजबूरी का नहीं, मजबूती का शासन
आचार्य श्री सुन्दर सागर जी महाराज ने अपने सम्बोधन में यह भी कहा कि जैन धर्म मजबूरी का नहीं, मजबूती का शासन है। मजबूती से धर्म करिए, मजबूरी में किए गए कार्य का फल भी मजबूरी जैसा ही मिलेगा। लालच सबसे खतरनाक है। जो व्यक्ति लालच से धर्म करेगा, यह मानकर चलना कि दुर्गति तो पक्की है। कोशिश करिए कि अंतिम समय तक धर्म साथ में रहे। दुनिया भीड़ जमा करने के लिए लालच देता है, ताकि नाम हो। ललाच में किया गया कार्य व्यर्थ ही होता है। दुनिया लालच देती है, जानते हुए कि यह मजबूरी है। किसी को जबर्दसी मंदिर ला सकते हौ, जबर्दस्ती अभिषेक, स्वाध्याय चर्या करा सकते हो, पर जबर्दस्ती से कर्म नहीं करा सकते हो। जैन शासन लालचियों का नहीं है। जैन शासन तो शूरवीरों का शासन है। लालच में किया गया कार्य गर्त की ओर ही ले जाएगा।

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