किस प्रकार हमारे दिगंबर जैन धर्म, हमारी संस्कृति और समाज में दिगंबर मुनियों की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। वर्तमान में, भगवान वृषभदेव ने पहली जैनेश्वरी दीक्षा दिगंबर मुनि के रूप में प्रयाग, इलाहाबाद में धारण की थी। यह साक्षात्कार हमें याद दिलाता है कि कैसे महान तपस्वियों के माध्यम से जैन धर्म की मुनि परंपरा सतत चलती आ रही है। पढ़िए अभिषेक अशोक पाटील की विशेष रिपोर्ट…
मुझे आज अत्यंत गौरव और प्रसन्नता है कि किस प्रकार हमारे दिगंबर जैन धर्म, हमारी संस्कृति और समाज में दिगंबर मुनियों की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। वर्तमान में, भगवान वृषभदेव ने पहली जैनेश्वरी दीक्षा दिगंबर मुनि के रूप में प्रयाग, इलाहाबाद में धारण की थी। यह साक्षात्कार हमें याद दिलाता है कि कैसे महान तपस्वियों के माध्यम से जैन धर्म की मुनि परंपरा सतत चलती आ रही है। मध्यकाल में कुंदकुंद स्वामी, उमास्वामी और भगवान महावीर जैसे महान संतों ने भी इस परंपरा को जीवित रखा।
आज भी हमें ऐसे तपस्वी संत मिलते हैं, जिन्होंने हमें जैन धर्म की मुनि परंपरा का सच्चा ज्ञान दिया है। बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी में, आचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज ने इस दिगंबर मुनि परंपरा का पुनर्स्थापन किया। उन्होंने हमें मोक्ष का मार्ग दिखाया और इस धरती पर सच्ची परंपरा का सूत्रपात किया। बन्धुओं, मुनि तो सदैव रहे हैं, लेकिन समय के प्रभाव के कारण दिगंबर जैन मुनि परंपरा में कुछ उल्लंघन हुए थे। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने मूलाचार ग्रंथ की आज्ञाओं के पालन पर जोर दिया, जिससे हमें सच्चा मार्ग दिखाया। साधु जीवन में उनके उपदेश आज भी हमारे लिए आदर्श हैं। मुझे गर्व है कि मैंने तीन बार आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के दर्शन किए और उनसे आर्यिका दीक्षा लेने की प्रार्थना की। 1953 में, जब मैं क्षुल्लीका अवस्था में थी, तब उन्होंने मुझे आचार्य वीरसागर जी महाराज के पास दीक्षा लेने के लिए आदेश दिया।
आचार्य शांतिसागर जी महाराज हमारे लिए एक वटवृक्ष के समान हैं। आज जितने भी दिगंबर मुनिराज हैं, वे सब उसी वटवृक्ष की शाखाएं हैं। यह सभी शाखाएं जैन धर्म के मोक्ष के मार्ग को हमारे सामने प्रशस्त कर रही हैं। आचार्य महाराज के जीवन के हर उपदेश और संदेश आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।













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