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व्यसन त्यागने से ही सम्मान बरकरार रहेगा : व्यसन की बुराइयों को प्रवचन के माध्यम से समझा रहे मुनिराज 


आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित हैं। यहां उनके सानिध्य में धार्मिक क्रियाएं हो रही है। इस अवसर पर मुनि श्री सारस्वत सागरजी महाराज धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की खबर…


नांद्रे (महाराष्ट्र ) आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित हैं। यहां उनके सानिध्य में धार्मिक क्रियाएं हो रही है। इस अवसर पर मुनि श्री सारस्वत सागरजी महाराज धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में अशुभ कर्म करने, कुकृत्य करने की आदत लगी है तो वह मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख रहता है। यदि कोई पुरुष व्यसनी है तो उसके जो कर्तव्य हैं माता-पिता के प्रति, पत्नी, बच्चों के प्रति वह उनको कभी पूरा नहीं करता। माता-पिता को यश दिलाना और उनका यश बढ़ाना बेटे का कर्तव्य है। माता-पिता के पैर आदि दबाना बेटे का कर्तव्य है। उनकी आज्ञा का पालन करना बेटे का कर्तव्य है। उनके बुढ़ापे का सहारा बनना बेटे का कर्तव्य है परंत, व्यसनी इन सबको भूलकर माता-पिता के जीवन के कमाएयश को, धन को और धर्म का नाश कर देता है और तो और बिना मौत के भी उनको मौत के घाट लगा देता है।

जीते जी मृत्यु के समान माता-पिता का जीवन कर देता है। मुनिश्री ने कहा कि व्यसनी पुरुष को उसकी पत्नी छोडकर चली जाती है क्योंकि, वह पति धर्म का पालन नहीं करता। उसके बच्चे भी उसका बिल्कुल सम्मान नहीं रखते। वे अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करते हैं। बच्चे अपने मित्रों के सामने अपने पिता को पिता कहना पसंद नहीं करते। व्यसनी के सारे रिश्ते-नातेदार दूरियां बना लेते हैं और वे यह सोचते हैं कि हमारे घर पर यह व्यसन की गंदगी न आ जाए। इसलिए सबसे अपनापन चाहते हो तो व्यसन से दूर रहो, निर्व्यसनी बनो।

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