भगवान महावीर ने मानव को अपने और समाज के कल्याण के लिए अंहिसा ही नहीं बल्कि सत्य, अस्तेय यानी चोरी ना करना, अपरिग्रह यानी जरूरत से ज्यादा वस्तुओ का संग्रह नहीं करना और ब्रह्मचर्य यानी संयम के साथ जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया। पढ़िए महावीर जन्मकल्याणक पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर जी महाराज का यह विशेष आलेख…
जब इस धरती पर चारों ओर हिंसा का तांडव मचा हुआ था। मनुुष्य एक-दूसरे को मारने के लिए आतुर थे। चारों ओर हिंसा की आग में, राग-द्वेष की भावना मेे, ईर्ष्या की लपटों में, क्रोध, मान, माया, लोभ में प्राणी मात्र जल रहा था। तब इस विश्व में वैशाली राज्य में अहिंसा के अग्रदूत भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने अपने आचरण, चर्या, उपदेश के माध्यम से जीओ और जीने दो, अहिंसा परमो धर्म यह दो मुख्य उपदेश दिए। महावीर ने मानव को अपने और समाज के कल्याण के लिए अंहिसा ही नहीं बल्कि सत्य, अस्तेय यानी चोरी ना करना, अपरिग्रह यानी जरूरत से ज्यादा वस्तुओ का संग्रह नहीं करना और ब्रह्मचर्य यानी संयम के साथ जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया। ये ऐसे सिद्धांत है, जो आज के भोगवादी समाज में शांति की सबसे बड़ी कुंजी है।
भगवान महावीर ने संदेश दिया कि समस्त आत्माएं एक समान हैं। धर्म करने का सबको समान अधिकार है। सब अपनी-अपनी क्षमता एवं मर्यादाओं में रह कर अहिंसा के साथ धर्म की परिपालना करें। उन्होंने अपने उपदेश में स्पष्ट कहा था कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।
प्राणी मात्र के लिए सुख, शांति की कामना
एक बार कुमार वर्धमान की मां त्रिशला दर्पण के सामने बैठ कर फूलों से अपना श्रृंगार कर रही थी। इतने में कुमार वहां आ गए और दृश्य देखा तो बोले मां यदि मेरी गर्दन काट कर किसी के गले में लटका दी जाए तो आपको कैसा लगेगा। मां बोली, बेटा आज तू कैसी बात कर रहा है। वर्धमान बोले मां जब ये फूल तोड़ा गया होगा तो उस वृक्ष की आत्मा कितनी दुखी हुई होगी। आपने अपनी सुन्दता के लिए इन निरीह फूलों की हत्या कर दी। इसे प्रभु की उपासना के लिए तोडा होता तो ठीक था, लेकिन खुद के भोग के लिए तोड़ना सर्वथा अनुचित है। इस प्रकार से भगवान महावीर के विचार प्राणी मात्र के लिए सुख, शांति की कामना करते थे। आज हम वर्तमान की छोड़ भूत, भविष्य की कल्पना करते हैं जिससे राग, द्वेष की आग हमारे अन्दर जलने लगती है।
आत्मिक शांति नष्ट हो जाती हैं। ये शांति वापस तभी आ सकती है जब हम प्रत्येक प्राणी में अपने आपको देखेंगे। यही भगवान महावीर का संदेश व सिद्धान्त था। इसी उपदेश को जीवन में उतारने का संकल्प हम सब आज महावीर जयंती पर करें। तभी हम बदल सकते हैं। ‘हम बदलेंगे तो विश्व अपने आप बदल जाएगा।’













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