श्री अजितनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक वस्तुओं का त्याग किए बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में दो प्रकार के साधु होते हैं कृ श्वेतांबर और दिगंबर। महरौनी से पढ़िए, राजीव सिंधई मोनू की यह खबर…
महरौनी (ललितपुर)। श्री अजितनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक वस्तुओं का त्याग किए बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में दो प्रकार के साधु होते हैं, श्वेतांबर और दिगंबर। श्वेतांबर साधु जहां सफेद वस्त्र धारण करते हैं, वहीं दिगंबर साधु पूर्णतः नग्न रहते हैं, चाहे सर्दी हो या गर्मी, वे रजाई या ऊनी वस्त्र का भी सहारा नहीं लेते। मुनिश्री ने कहा कि कपड़ा भी एक भौतिक वस्तु है, जो शरीर की कामनाओं को ढकने के लिए प्रयुक्त होता है।
जब साधु का जीवन विकारों से मुक्त हो जाता है, तब उसे वस्त्र की आवश्यकता नहीं रहती। जिनके मन में कोई खोट नहीं, उनके तन पर कोई लंगोट नहीं, यह उक्ति दिगंबर साधुओं के जीवन पर पूरी तरह लागू होती है। उन्होंने कहा कि दिगंबर साधु चारों दिशाओं को वस्त्र मानते हैं, धरती को बिछौना और आकाश को ओढ़ना। उनका जीवन कठोर तप, ध्यान, संयम और साधना से भरा होता है।
अहिंसा के अनुपालन का सर्वाेच्च उदाहरण
धर्मसभा में उपस्थित मुनि श्री मेघदत्त सागर महाराज ने कहा कि दिगंबर साधुओं का नग्न रहना केवल त्याग नहीं बल्कि सूक्ष्म जीवों की रक्षा का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा कि वस्त्रों की सफाई में जल में रहने वाले अनगिनत सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है, जिससे बचने के लिए दिगंबर साधु नग्न रहते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार एक निष्पाप शिशु नग्न अवस्था में निर्दाेष और निर्मल होता है, उसी प्रकार दिगंबर साधु भी वासनाओं और सांसारिक इच्छाओं से मुक्त होकर पवित्रता के प्रतीक बनते हैं। इस अवसर पर नगर सहित आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों की संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने पहुंचकर मुनिश्री के प्रवचनों को श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।













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