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श्री भक्तामर महामंडल विधान का आखिरी दिन : धार्मिक अनुष्ठान आत्म साधना का साधन – मुनि पूज्य सागर 

पारसोला। अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज, आर्यिका प्रसन्न मति माताजी और क्षुल्लक अनुश्रमण सागर के सानिध्य में चल रहे सात दिवसीय श्री भक्तामर महामंडल विधान का समापन हुआ।

जिसमें सातों दिन में कुल 2688 अर्घ्य चढ़ाए गए और 2100 मंत्रों के साथ आहुति दी गई। विधान के आखिरी दिन सुबह 3:30 बजे से धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हुआ, जिसमें भगवान का पंचामृत अभिषेक अनेक फलों के रस के साथ किया गया।

श्री भक्तामर महामंडल के मंत्रों की हवन में आहुतियां दी गईं। अनुष्ठान कुल 15 घंटे तक चला। भक्तामर काव्य के अंतिम काव्य के 56 अर्घ्य और हवन में मंत्र की आहुति सौधर्म इन्द्र मंजुला देवी-आदेश घाटलिया द्वारा दी गई। वहीं शांतिधारा अजीतमल डागरिया द्वारा की गई।

श्रीजी का निकाला गया जुलूस

इसके बाद शोभायात्रा के साथ जिनेंद्र भगवान को श्यामा वाटिका में ले जाया गया। वहां 51 हवन कुंड में 251 श्रावकों द्वारा 12 राशि, 27 नक्षत्र, 9 ग्रह के 24 तीर्थंकर के पूजन के साथ 108 नक्षत्रों का चरण पूजन कर 1008 मंत्रों के साथ आहुति दी गई।

हवन में तीन मुख्य कुंड थे। प्रथम कुंड पर हवन का लाभ विनोद वेगरिया, दूसरे कुंड पर मांगीलाल वगेरिया और तीसरे कुंड पर हवन का लाभ सुषमा, संध्या चंदावत, मनीष, भरत पंचोरी, पुष्पा शेषकरण कोठारी, पंकज पचोरी को प्राप्त हुआ।

संपूर्ण विधि-विधान का काम पंडित कीर्तिश जैन द्वारा किया गया। चांदी के लोगों से जाप का लाभ संपतीलाल घाटलिया को मिला। मंडप पर स्थापित चार कलश ललित कुमार वगेरिया,विनोद पचोरी,प्रकाश सेठ,प्रकाश वागेरिया को प्राप्त हुए। मंडप पर चारों कुंंडो पर धूप से आहुति रमेश वगेरिया ,श्रीपाल भावेश मकनावत, सुरेन्द्र मेदावत,मांगीलाल वगेरिया द्वारा की गई। पुण्यावाचक संदीप वगेरिया को प्राप्त हुआ ।

दुखों से बचाए रखता है अनुष्ठान

इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि धार्मिक अनुष्ठान आत्म साधना का साधन है। धार्मिक अनुष्ठान से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक कष्ट दूर होता है। ये आने वाले दुखों से भी बचाए रखता है। जीवन में अगर धार्मिक अनुष्ठान करने का अवसर मिले तो तन,मन,धन करना। वह अवसर चूक गया तो फिर वापस नहीं मिलेगा।

मुनि श्री ने कहा कि धार्मिक अनुष्ठान करने का अवसर पुण्य आत्मा को ही मिलता है। अगर धार्मिक अनुष्ठान करने का भाव नहीं हो और संसारी कार्य करने की ओर मन जाए तो समझना पाप का कार्य है।

सम्मान किया गया

पंडित कीर्तिश जैन,बाबूलाल सरिया,प्रकाश पचोरी,दीपेश वेगरिया,मांगीलाल डागरिया,सुषमा चंदावत,मनोहर मेदावत का स्वागत किया गया ।

 

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