भारत में ऐसा अद्वितीय आयोजन प्रथम बार महरौनी के यशोदय तीर्थ में जगतपूज्य मुनिपुंगव सुधासागर महाराज एवं क्षुल्लक गम्भीर सागर महाराज के पावन सानिध्य में हो रहा है जब चौबीस समोशरण एवं एक मुख्य समोशरण में बैठकर श्रावकजन जिन आराधना करेंगे साथ ही साथ भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की क्रियाएं भी की जाएगी। पढ़िए राजीव सिंघाई विशेष रिपोर्ट –
महरौनी (ललितपुर)। भारत में ऐसा अद्वितीय आयोजन प्रथम बार महरौनी के यशोदय तीर्थ में जगतपूज्य मुनिपुंगव सुधासागर महाराज एवं क्षुल्लक गम्भीर सागर महाराज के पावन सानिध्य में हो रहा है। जब चौबीस समोशरण एवं एक मुख्य समोशरण में बैठकर श्रावकजन जिन आराधना करेंगे। साथ ही साथ भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की क्रियाएं भी की जाएंगी। शुक्रवार को प्रातःकाल मंगलाष्टक, दिग्बंधन, रक्षामंत्र, शांति मंत्र ,जिन अभिषेक और शांतिधारा हुई। शांति धारा का करनें का सौभाग्य आनंद सराफ और प्रमोद चौधरी को प्राप्त हुआ। ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश के दिशा-निर्देश में कल्पद्रुम महामंडल विधान की पूजन की गई।
जो भी दान देता है उसकी प्रशंसा करो
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा कि धन्य दाता धन्य पात्र की भावना से ही होगा भक्त का उद्धार होता है । भक्त को अगर इच्छापूर्ति करना हो तो कल्पद्रुम चौबीसी समावशरण विधान कर लेना । विघ्न बाधाओं को जीवन में न आने देना हो तो ये विधान ही एक उपाय है। जो भी दान देता है उसकी प्रशंसा करो तो भक्त को इच्छापूर्ति का वरदान मिलेगा देने वाले को धन्यदाता कहो ।इच्छापूर्ति का वरदान चाहते हो तो मंदिर बनाने वाले की प्रशंसा करो ।एक समय रामचंद्र का था ।चार पुत्र अलग अलग माता से हुए पुत्र मे कोई छल नही था ,बहुत प्रेम था । तीनो छोटे भाई चाहते थे की मेरे बड़े भाई रामचंद्र ही राजगद्दी पर विराजेंगे। वनवास जाने पर भी भरत ने रामचंद्र की खड़ाऊ को राजगद्दी पर रख राज किया ।परंतु आज वर्तमान एक ही मां के चार पुत्र होते हुए भी एक दूसरे पर मुकदमा कर देता है ।गुरुदेव ने कहा की बेटे के मोह में अपने को कैकैय और मंथरा मत बनाओ ।संतान की खातिर मां का घर में क्लेश करना उचित नहीं है।कैकई और मंथरा के विचार से अयोध्या ने दुखो को भोगा और अपने ही पुत्र से कैकई मां शब्द सुनने को तरस गई ।

श्री रामचंद्र ने भी अपने प्रजा के लिए सोचा की भरत को आदेश दिया और कहा जाओ 14 वर्ष राज को सम्हालो ।रघुवंश की नीति कहलाती है कि अपने पक्ष को अपने भाई के लिए पीछे कर देना जिस प्रकार भरत ने अपने बड़े भाई के लिए पीछे हो गए। साधु के आहार कराते समय यही भावना भाओ की में कब ऐसे आहार लूंगा और कब निर्गंथ होऊंगा। मुनिश्री सुधासागर महाराज को आहार देने का सौभाग्य मुकेश सराफ और क्षुल्लक गम्भीर सागर को आहार देने का सौभाग्य संजीव शास्त्री को प्राप्त हुआ।













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