श्रवणबेलगोला मठ के समाधि लीन स्वस्ति श्री जगद्गुरु चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी पर डॉ. अरिहन्त कुमार जैन, असिस्टेंट प्रोफेसर, जैन अध्ययन संस्थान, क. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ धर्म स्टडीज, सोमैया विद्याविहार यूनिवर्सिटी, मुम्बई का विशेष संस्मरण…
जगद्गुरु कर्मयोगी स्वतिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी एक ऐसे बहुआयामी महान् व्यक्तित्व थे, जिन्होंने जैन धर्म दर्शन, संस्कृति, पुरातत्व, कला, प्राच्य भाषा एवं साहित्य के संरक्षण एवं संवर्धन में एक महानायक के रूप में भूमिका निभाई और अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। आप श्रेष्ठ सन्त के रूप में संयमित एवं स्वाध्यायमयी व्रतनिष्ठ जीवन शैली को जीते रहे। आपने गोम्मटेश्वर भगवान बाहुबली के महामस्ताभिषेक जैसे चार महाकुम्भ जैसे अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम, सम्पूर्ण देश की समाज को जोड़कर, अपने कुशल नेतृत्व के माध्यम से, महमस्तकाभिषेक सफलतापूर्वक सम्पन्न करा कर नित नए कीर्तिमान स्थापित किए। इस पावन उपलक्ष्य में श्रवणबेलगोल पधारे अनेक दिगंबर जैन आचार्यों के बड़े-बड़े संघों, जिनमें हजार से भी ज्यादा पिच्छिधारी संयमियों की चर्या के अनुसार आपने विनयपूर्वक उनकी समुचित व्यवस्था का ध्यान रखा।

समाज कल्याण में अग्रणी
पूज्य स्वामी जी ने साधनारत होते हुए भी समाज कल्याण हेतु चिकित्सालयों को बनवाकर उनका समुचित संचालन करने, छात्र- छात्राओं के उज्ज्वल भविष्य हेतु इंजीनियरिंग एवं मेडिकल कॉलेज आदि शिक्षा संस्थानों का संचालन एवं लौकिक शिक्षा के साथ-साथ प्राच्य प्राकृत भाषा, हस्तलिखित पांडुलिपियों, शिलालेखों का श्रुतकेवली एजुकेशन ट्रस्ट,राष्ट्रीय प्राकृत संस्थान के माध्यम से संरक्षण एवं संवर्धन करने जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं, जिनके लिए शब्द भी सीमित पड़ जाएं।

प्राप्त हुआ मार्गदर्शन
पूज्यस्वामी जी के साथ कई अविस्मरणीय स्वर्णिम यादें जुड़ी हैं । मेरे जीवन पर उनका बहुत प्रभाव रहा है । वैसे तो वे सभी के अपने थे, परंतु विद्वान् के रूप में प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी (पूर्व अध्यक्ष, संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय) एवं माताश्री श्रीमती मुन्नी जैन, वाराणसी से उनका विशेष अपनत्व के कारण मुझे भी बाल्यकाल से ही समय-समय पर उनका सानिध्य, स्नेह, आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। सरस्वती पुत्र विद्वानों का वह बहुत बहुमान करते थे। पिताजी से तो उनकी घंटों तत्त्वचर्चा तथा किन्हीं-किन्हीं विषयों पर परस्पर परामर्श आदि चलता रहता था ।

की थी भविष्यवाणी
मुझे याद है कि बाल्यकाल में ही उन्होंने मुझे देखकर अपनी अलौकिक प्रज्ञा से कहा था कि भविष्य में आप प्राच्य विद्या एवं भाषा के क्षेत्र में अच्छे काम करेंगे। उस वक्त शायद मैं इन शब्दों के वास्तविक अर्थ से भी परिचित नहीं था। आज शायद उनके वचनों की ही सिद्धि का प्रताप है कि मैं शिक्षा के क्षेत्र में हूं, और सतत् रूप से सीखते हुए जैन दर्शन एवं प्राकृत भाषा तथा साहित्य की सेवा का प्रयास कर रहा हूं। अंग्रेजी में प्रकाशित ‘प्राकृत टाइम्स इंटरनेशनल न्यूज़लेटर’ उसी प्रयास का एक हिस्सा है, जिसके लिए स्वामी जी ने भरपूर आशीर्वाद प्रदान किया था।

अविस्मरणीय क्षण
भगवान महावीर के 2600वें जन्मकल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में पूज्य स्वामी जी का भगवान महावीर की जन्मभूमि वैशाली पधारना हुआ, इस दौरान उनका वाराणसी में तीन दिन का प्रवास रहा । इन तीन दिनों में पूरा एक वे हमारे ‘अनेकान्त विद्या भवन’ में रहे। यह हमारे लिए अविस्मरणीय क्षण था कि स्वामी जी घर पधारे, हम सभी को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ एवं आपने घर के पुस्तकालय में स्वाध्याय एवं घंटों चर्चा की। आपने दक्षिण भारत से ही प्रतिभावान छात्रों को पिताश्री के संरक्षकत्व एवं मार्गदर्शन में विद्याध्यायन हेतु श्री स्याद्वाद महाविद्यालय,वाराणसी भेजा। वही छात्र जैन दर्शन, प्राकृत एवं जैनागम के उच्चकोटि के विद्वान बनकर आज दक्षिण भारत के अर्हन्तगिरि, कनकगिरि, हुमचा आदि के भट्टारक स्वामी जी हैं, जो कुशलता एवं सफलता पूर्वक सिद्धक्षेत्रों के संरक्षण के साथ-साथ क्षेत्र का विकास भी कर रहे हैं । इस बीच पिताश्री को गोम्मटेश्वर विद्यापीठ पुरस्कार (सन् 2000) से भी सम्मानित किया गया।
श्रवणबेलगोला पर डॉक्युमेंट्री
सन् 2006 के महामस्तकाभिषेक में पूज्य स्वामी जी ने पिताश्री प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी वाराणसी को ‘अखिल भारतीय जैन विद्वत सम्मेलन’ के संयोजकत्त्व तथा ज्येष्ठ भ्राता डॉ. अनेकान्त कुमार जैन, (श्रीलाल बहादुर राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ,नई दिल्ली) को सहसंयोजकत्व का दायित्व प्रदान किया, जो कि ऐतिहासिक सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस समय पिताश्री ‘अखिल भारतीय दिगम्बर जैन विद्वद् परिषद्’ के अध्यक्ष थे। इसी दौरान मेरे भीतर के हुनर को उन्होंने सर्वप्रथम अवसर प्रदान किया। मुझ पर विश्वास जताकर मुझे श्रवणबेलगोला एवं राष्ट्रीय प्राकृत संस्थान पर डाक्यूमेंट्री फिल्म के निर्देशन की प्रेरणा तथा सहयोग प्रदान किया। यही वह समय था, जब मुझे उनके सानिध्य में रहकर उनके महान बहुआयामी व्यक्तित्त्व को करीब से जानने का अवसर प्राप्त हुआ। श्रवणबेलगोला के इतिहास, पुरातत्त्व तथा प्राकृत भाषा की महत्ता को बताती आपके मार्गदर्शन में हिंदी तथा अंग्रेजी भाषा में बनी “प्राकृत भाषा – एक प्राचीन समृद्ध परंपरा”(https://youtu.be/aiiuA0sd8Sc) नामक इस रिसर्च डाक्यूमेंट्री फिल्म को राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में भी प्रदर्शन के लिए चुना गया तथा पूरे महामस्तकाभिषेक के कार्यक्रम के समय महीनों तक इसे जगह-जगह प्रदर्शित किया गया। इस महामस्तकाभिषेक के बाद भी हमें हर 1-2 वर्षों में भगवान बाहुबली के दर्शनार्थ श्रवणबेलगोला जाने का तथा स्वामी जी से मार्गदर्शन का अवसर प्राप्त होता रहा।
फिर मिला अवसर
सन् 2016 आते-आते 2018 के महामस्तकाभिषेक के कार्यक्रमों की तैयारियां शुरू हो गईं। पूज्य स्वामी जी ने पुनः पिताश्री को याद किया और महामस्तकाभिषेक 2018 के मंगलाचरण के रूप में सबसे पहले कार्यक्रम राष्ट्रीय संस्कृत विद्वत सम्मेलन हेतु पुनः पिताश्री प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी को मुख्य संयोजकत्त्व तथा डॉ अनेकान्त जी, नई दिल्ली को संयोजकत्त्व का दायित्व दिया। अब तक मैं बड़ा हो गया था, अतः कार्यकर्ता के रूप में मुझे भी इस विद्वत सम्मेलन की तैयारी करने का अवसर प्राप्त हुआ। हमने मिलकर पूरे मनोयोग से स्वामी जी के मार्गदर्शन में सम्मेलन का आयोजन सुनियोजित रूप से किया। यह पहला अवसर था जब इस त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संस्कृत विद्वत सम्मेलन में पूरे देश के संस्कृत विश्वविद्यालयों के कुलपति, पूर्व कुलपति, पद्मश्री एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ मूर्धन्य विद्वानों ने हिस्सा लिया और यहां के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना। यह सम्मेलन ऐतिहासिक सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ।
अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का भी आयोजन
कार्यक्रमों के इसी क्रम में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसमें पूज्य स्वामी जी ने अन्य विदुषी महिलाओं के साथ हमारी मां डॉ. मुन्नी जैन जी को भी ब्राह्मी लिपि के अध्ययन-अध्यापन तथा प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान हेतु ‘आदर्श महिला प्रशस्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया। आपने बड़ी बहन डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को नवीन संसद के भूमिपूजन में प्राकृत गाथाओं के सस्वर पाठन हेतु हर्ष व्यक्त कर आशीर्वाद दिया, जो कि पूरे देश में चर्चा का विषय बना। हमने महामस्तकाभिषेक में जलाभिषेक करने का भी सौभाग्य प्राप्त किया। इस प्रकार अनेक कार्यक्रमों के मूल में रहकर स्वामी जी ने पूरे महामस्तकाभिषेक का प्रतिनिधित्व किया।
सम्मान के बाद गए श्रवणबेलगोला
गोम्मटेश्वर भगवान बाहुबली के आशीर्वाद से 2019 में पिताश्री प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी को प्राकृत भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में महनीय योगदान हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार 2018 से तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संस्कृत साहित्य में महनीय योगदान हेतु ‘विशिष्ट पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इसके पश्चात् हम पुनः भगवान बाहुबली के दर्शनार्थ श्रवणबेलगोला गए। पूज्य स्वामी जी ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त किया। वर्ष 2020 के कोरोनाकाल में पिताजी ने राष्ट्रीय प्राकृत शोध संस्थान (श्रवणबेलगोला) के प्राकृत डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट कोर्स को ऑनलाइन पढ़ाया, जिसमें देश-विदेश के सैकड़ों लोगों ने प्राकृत भाषा एवं साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया। इन कक्षाओं का संचालन जैन फाउंडेशन (बेंगलुरु) ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से आयोजित करके किया। 2021 में मेरी नियुक्ति बंगलुरू स्थित जैन यूनिवर्सिटी में हो गयी। जैन दर्शन विभाग के विकास हेतु बीच -बीच में श्रवणबेलगोला जाकर स्वामी जी से मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ । इस बीच जैन यूनिवर्सिटी द्वारा नेशनल जैन सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें स्वामी जी का मंगल सानिध्य प्राप्त करने हेतु हमने बहुत प्रयास किये, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वह नहीं आ सके । उन्होंने उस नेशनल सेमिनार की सफलता हेतु अपना आशीर्वचन और मंगल संदेश हमें प्रेषित किया ।
भेंट की प्राकृत टाइम्स
इसके बाद भी हमारा सपत्नीक (श्रीमती नेहा) श्रवणबेलगोला जाना हुआ। हमने उन्हें प्राकृत टाइम्स के अब तक के सारे अंकों की प्रतियां भेंट की। उन्होंने हम दोनों को आशीर्वाद देते हुए जैनविद्या तथा प्राकृत भाषा के लिए स्वतंत्र अकादमी की स्थापना करने के लिए प्रेरित भी किया। उसके बाद मेरी नियुक्ति सोमैया विद्याविहार यूनिवर्सिटी, मुम्बई में हो गयी, जिसके लिए उनका पुनः आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
विश्वास करना मुश्किल
उनका यूं जाना जैन समाज के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है। यह विश्वास करना मुश्किल है कि वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वह और उनकी प्रेरणाएं हम सभी के हृदय में सदा जीवंत रहेंगी। हमें विश्वास है कि पूज्य भट्टारक महास्वामी जी के द्वारा चयनित और उन्हीं के पट्ट पर अभिषिक्त पूज्य आगमकीर्ति जी, जो कि अब अभिनव ‘चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी’ बनकर इन्हीं के समान विकास के कार्य करेंगे। पूज्य स्वामी जी को उनकी उत्कृष्ट साधना के फलीभूत सद्गति प्राप्त हो, इन्हीं भावनाओं के साथ पूज्य स्वामी जी को शत-शत नमन..भावपूर्ण विनम्रश्रद्धांजलि ।













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