आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा-जीवन में तीन का विशेष महत्व होता है । पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन न्यूज़ के साथ…
रांची । दिनांक 25 जुलाई को वासुपूज्य जिनालय रांची के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा-जीवन में तीन का विशेष महत्व होता है -घड़ी में तीन सुई होती है जो समयबताती है, जज ऑडर देते समय तीन बार , ऑडर , ऑडर, ऑडर बोलते है, तलाक के समय भी तीन बार बोला जाता है तलाक तलाक तलाक।
जीवन में तीन का विशेष महत्व होता है
धर्म और मान्यताओं की बात करें तो सनातन धर्म में सृष्टि के रचयिता तीन है , ब्रह्मा, विष्णु और महेश साथ ही देवियां भी तीन लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती का अहम स्थान है। धर्म में आरती करनी हो तो तीन बार की जाती है। किसी पवित्र स्थल की परिक्रमा करनी हो तो उसे भी तीन बार करने का विधान है।ऐसे ही जीवन की तीन अवस्थायें होती है बचपन , जवानी , बुढ़ापा |

हम संसार में प्रवासी बनकर आये है , निवासी बनकर नहीं आये क्योंकि एक दिन सभी का मरण होना निश्चित है । जिस – जिस का जन्म हुआ उसका मरण निश्चित है । चाहे राजा हो , राणा हो , छत्रपति हो सभी को एक दिन इस संसार से जाना है।यह मनुष्य पर्याय में हमें भगवान की भक्ति करने को लिये मिली है ।
दुख अपने पर हावी मत होने दो
माताजी ने बताया कि जीवन में दुखों का आना पिछले भव के कर्मो की देन है,इसलिए जीवन मे दुख आए तो उसे अपने पर हावी मत होने दो। दुख आएगा और चला भी जाएगा पर इसे हमेशा अपने से जोड़े रखने से और सिर्फ दुखो की ही चर्चा करने से हमें भविष्य में भी इसका फल भोगना पड़ता है। जीवन में सकारात्मकता का होना बहुत जरूरी है। सकारात्मकता के अभाव में और दुखों से परेशान मानसिक तनाव में आकर ही कुछ इंसान अच्छी डिग्री और शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद अपना जीवन नष्ट कर लेते है, जो कि बहुत गलत है।
60 – साल के धर्म साधना में लीन होना चाहिये
मनुष्य जीवन बाल्यावस्था, युवावस्था व वृद्धावस्था तीन भागों में बीतता है। बाल्यावस्था में समझ नहीं होने के कारण धर्म-आराधना कठिन होती है। वृद्धावस्था में शरीर इतना कमजोर हो जाता है कि मनुष्य सही तरीके से नहीं चल पाता है और उसे सहारे या लकड़ी की सहायता की जरूरत होती है। इसी कारण ज्ञानीजन कहते हैं कि धर्म-आराधना, तप, तपस्या के लिए शरीर का साथ होना आवश्यक है और बाल्यावस्था व वृद्धावस्था में शरीर का साथ मिलना मुश्किल है। इसलिए जो भी धर्म-आराधना, तप-तपस्या आदि युवा अवस्था में ही संभव है । इस संसार में कोई किसी का नहीं है । इसलिये हमें अपनी आत्मा के कल्याण के लिये , धर्म पुरुषार्थ करना चाहिये । हमनें अपने बच्चों के पालन – पोषण में , उनको पढ़ाने – लिखाने में , उनके शादी – विवाह कराने में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया । 60 साल के बाद सरकार भी रिटार्यडमेन्ट कर देती है । इसी प्रकार हमें भी 60 – साल के बाद संसार के कार्यों से निवृत्त होकर धर्म साधना में लीन होना चाहिये ।













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