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उपाध्याय श्री विहसंत सागर ने दिए प्रवचन : यदि मुनि बनना है तो भावलिंगी मुनि बनो क्योंकि भावलिंगी सिर्फ कर्म का क्षय करने लिए होता है


आरोग्यमय वर्षा योग समिति द्वारा आचार्य विराग सागर महाराज के चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की। पढ़िए एक रिपोर्ट…


डबरा। आरोग्यमय वर्षा योग समिति द्वारा आचार्य विराग सागर महाराज के चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की। उसके बाद गुरुदेव ने भक्तामर स्तोत्र के आठवें काव्य में कहा कि जिस प्रकार कमल के पत्ते के प्रभाव के कारण पत्ते पर पड़ी जल की बूंद मोती सी लगती है, वैसे ही मुझ अल्पज्ञ के द्वारा किया गया यह स्तवन सज्जनों के मन को आकर्षित करेगा तो इसमें आपका ही प्रभाव है।

दोपहर कालीन स्वाध्याय में बताया गया कि हमारा उद्देश्य मुनि बनने का होना चाहिए। भगवान कहते हैं कि यदि मुनि बनना है तो भावलिंगी मुनि बनो क्योंकि भावलिंगी सिर्फ कर्म का क्षय करने लिए होता है और द्रव्यलिंगी बाहर की वेशभूषा है।

मुनि तो मात्र निष्कर्म बनने के लिए बनते हैं। आत्मप्रदेशों में हलन- चलन का होना योग है, योगी तो उपयोग को थामने के लिए बनते हैं। जैन दर्शन में योग तीन प्रकार के बताए हैं – मन, वचन,काय। मुनि तो हमेशा पांच इंद्रियों के 28 विषयों से विरहित रहते हैं।

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